वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 | Wednesday, 28 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंअतिथि लेखन

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

अतिथि लेखन

गंगा काट रही है जमीन, उजड़ रहा संसार, खो रहा बचपन! : अबिन मित्र

अपराजिता•28 अक्टूबर 20265 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया

मालदा का गंगा का कटाव केवल नदी के तट के टूटने की घटना नहीं है। यह इंसानों के सपने टूटने का इतिहास, जड़ें उखड़ने की पीड़ा और अपनी ही जन्मभूमि पर परवासी बन जाने की एक निर्मम कहानी है। यहाँ जब गंगा टूटती है, तो केवल मिट्टी का एक टुकड़ा पानी में नहीं समा जाता, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की यादें, एक बच्चे का सुरक्षित बचपन और एक माँ के अपने परिवार को सहेज कर रखने का आखिरी आशियाना भी ढह जाता है।

गंगा काट रही है जमीन,

उजड़ रहा संसार,

खो रहा बचपन!

* अबिन मित्र *

एक माँ अपने छोटे से बेटे का हाथ थामे खड़ी है। आँखों के सामने उनका घर धीरे-धीरे गंगा की ओर झुक रहा है। जिस घर में इस बच्चे का जन्म हुआ था, जिस आँगन में उसने घुटनों के बल चलना सीखा था, जिस दीवार से पीठ टिकाकर माँ ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया था, जिस छत के नीचे बारिश की रात में दोनों ने पास-पास लेटकर कहानियाँ सुनी थीं, वही घर आज गंगा की भेंट चढ़ रहा है। माँ नहीं जानती कि अगली रात वह अपने बच्चे को कहाँ सुलाएगी। बच्चा शायद अभी भी यह नहीं समझ पा रहा है कि उसकी दुनिया टूट रही है। वह बस माँ का आँचल पकड़कर पूछता है,

"माँ, हमारा घर कहाँ जाएगा? क्या हम कभी घर वापस नहीं लौटेंगे?"

क्या इस सवाल का कोई जवाब किसी सरकारी दफ़्तर में है? क्या किसी मंत्री के भाषण में है? क्या केंद्र या राज्य सरकार की किसी फ़ाइल में है?

मालदा का गंगा का कटाव केवल नदी के तट के टूटने की घटना नहीं है। यह इंसानों के सपने टूटने का इतिहास, जड़ें उखड़ने की पीड़ा और अपनी ही जन्मभूमि पर परवासी बन जाने की एक निर्मम कहानी है। यहाँ जब गंगा टूटती है, तो केवल मिट्टी का एक टुकड़ा पानी में नहीं समा जाता, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की यादें, एक बच्चे का सुरक्षित बचपन और एक माँ के अपने परिवार को सहेज कर रखने का आखिरी आशियाना भी ढह जाता है।

मालदा के गंगा किनारे के विस्तृत इलाकों के लोगों के लिए बारिश का मतलब ही आतंक है। नदी का जलस्तर बढ़ते ही सीने में सिहरन पैदा हो जाती है। रात के अंधेरे में मिट्टी धंसने की आवाज़ सुनकर नींद उड़ जाती है। कालियाचक-3 ब्लॉक के गोलाप मंडलपाड़ा में एक ही दिन के कटाव में छह परिवारों के घर नदी में विलीन हो गए। खासकोल इलाके में लगभग 50 परिवारों के 300 लोगों को एक स्कूल में ठूँस-ठूँस कर शरण लेनी पड़ी है। मानिकचक के केशरपुर में 282 पीड़ित परिवार आज भी पुनर्वास की उम्मीद में बैठे हैं, यहाँ 'डबल इंजन' सरकार भी विफल साबित हुई है। क्या किसी परिवार का घर उजड़ जाने पर केवल मुआवज़े की रकम से उसकी सारी क्षति की भरपाई की जा सकती है? क्या हाथ में पैसे आते ही ज़मीन तैयार हो जाती है? नया घर बनाने की जगह न होने पर लोग उस पैसे को लेकर कहाँ जाएँगे? स्कूल में शरण लेने वाले बच्चे की पढ़ाई, बुजुर्गों का इलाज, परिवार की आजीविका—इन सबकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या लोगों को बार-बार राहत शिविरों की कतार में खड़ा करके, मुआवज़े के वादे करके और अस्थायी बाँध बनाकर इस संकट का स्थायी समाधान संभव है?

ज़रूरत इस बात की है कि विशेषज्ञों के ज़रिए पूरी तरह से सर्वे कराया जाए, कटाव प्रभावित इलाकों की पहचान कर तत्काल कदम उठाए जाएं। साथ ही, नदी की स्वाभाविक गति और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक पद्धति से नदी के तटों का संरक्षण किया जाए। जो लोग पहले ही सब कुछ गंवा चुके हैं, उनके लिए सुरक्षित ज़मीन पर पुनर्वास, बसासत का अधिकार, पर्याप्त मुआवज़ा, आजीविका की गारंटी और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तथा इलाज की व्यवस्था की जानी चाहिए। सिर्फ घर बनाने के लिए पैसे नहीं, बल्कि घर बनाने के लिए ज़मीन भी देनी होगी। सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि जीवन में दोबारा खड़े होने का अवसर देना चाहिए।

सीपीआई(एम) की यह पुरानी माँग रही है कि गंगा के कटाव को एक स्थानीय समस्या के रूप में न देखकर एक गंभीर राष्ट्रीय आपदा के रूप में लिया जाना चाहिए। केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों से एक वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना तैयार की जानी चाहिए। नदी की प्रकृति और गाद (सिल्ट) जमने का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, नदी तट का आवश्यक संरक्षण, उपयुक्त तकनीक का इस्तेमाल और पर्याप्त धन का आवंटन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

रात गहरी होती जाती है। स्कूल के अंधेरे कमरे में माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर लेटी है। बाहर बारिश हो रही है। नींद में शायद वह बच्चा अभी भी अपने पुराने घर के आँगन में दौड़ रहा है। माँ सो नहीं पा रही है। उसकी आँखों के सामने वही घर तैर रहा है, जो अब कभी वापस नहीं मिलेगा। सुबह उठकर बच्चा फिर वही सवाल पूछेगा, "माँ, हम घर कब चलेंगे?" माँ क्या जवाब देगी? क्या वह कहेगी कि सरकार इंतज़ाम कर रही है? क्या वह कहेगी कि मुआवज़ा मिलते ही नया घर बन जाएगा? या फिर अपने बच्चे की आँखों में देखकर चुपचाप रो पड़ेगी? इस रोने की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? मालदा के लोग भीख नहीं माँगते। वे चाहते हैं कि उनका घर बचे, उनकी ज़मीन बचे और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे। वे नहीं चाहते कि उनके बेटे-बेटी अपनी जन्मभूमि खोकर प्रवासी मजदूरों की तरह अनिश्चित जीवन जीने को मजबूर हों। वे नहीं चाहते कि हर साल बरसात के साथ उनका संसार उजड़ने का डर भी लौट आए। गंगा अपनी स्वाभाविक गति से बहेगी। लेकिन क्या नदी के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन को यूँ ही अनिश्चितता के हवाले छोड़ दिया जाएगा?

मालदा का गंगा कटाव आज इंसानियत को बचाने की लड़ाई है। एक विशाल जनसमूह के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। हज़ारों माताओं के आँसू पोंछने की लड़ाई है। हज़ारों बच्चों के सवालों के जवाब देने की लड़ाई है। इस बहाव में और कितनी माताओं का संसार बहेगा? और कितने बच्चों का बचपन बेघर होगा? और कितने लोगों के आँसुओं के बाद सरकार की नींद खुलेगी?

.

.

(लेखक सीपीआई (एम) केंद्र राज्य सोशल मीडिया के सदस्य हैं)

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

गंगा काट रही है जमीन, उजड़ रहा संसार, खो रहा बचपन! : अबिन मित्र

प्रकाशित: 28 अक्टूबर 2026 • 5 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

364 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

363 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

339 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

334 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

किताबों के लिए पदयात्रा - बुक-स्टॉल और किताबों पर बर्बर हमले के खिलाफ पुस्तक प्रेमियों की पुकार पर

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 • 15:00 | विद्यासागर मूर्ति, कॉलेज स्क्वायर , कोलकाता

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राज्य

" लोगों से डरते हैं, इसीलिए मतदाता सूची से नाम काट देते हैं " - मोहम्मद सलीम

आरएसएस की किताब से पन्ने फाड़कर चुनाव आयोग ने एसआईआर (SIR) किया है। मतदाता सूची से कमजोर और गरीब लोगों के नाम हटाए गए हैं। अल्पसंख्यकों के नाम हटाए गए हैं। हम वामपंथियों ने बार-बार राज्य में इस एसआईआर प्रक्रिया का विरोध किया है।अब जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। इस अन्याय की जिम्मेदारी लेनी होगी।

कुछ घंटे पहले

अतिथि लेखन

अस्थिर अरुणाचल, मीडिया खामोश!- अबिन मित्र

अरुणाचल प्रदेश का सियांग सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि विकास किसके लिए है, फैसले कौन ले रहा है, और इसकी सबसे बड़ी कीमत किसे चुकानी पड़ रही है? क्या प्रगति के नाम पर जल-जमीन-जंगल के अधिकार छीन लिए जाएंगे? क्या तरक्की के नाम पर आदिवासियों का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा? क्या सियांग के लोगों की आवाज आखिरकार बाँध के रुके हुए पानी में हमेशा के लिए डूब जाएगी? या फिर देश के लोग इस खामोशी की दीवार को तोड़ेंगे?

26 अक्टूबर 2026

राष्ट्रीय

ईज़ीसीसी (EZCC) में सीताराम येचुरी पर सेमिनार

22 नवम्बर को विधाननगर के ईज़ीसीसी (EZCC) में सीताराम येचुरी के जीवन और संघर्ष पर एक सेमिनार आयोजित किया जाएगा।

26 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
अतिथि लेखन

'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी।' अनीश अंकुर की कलम से

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

अतिथि लेखन

भोजन और भजन के नाम पर बंगाल की चेतना पर हमला। ~मालिनी भट्टाचार्य~

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

अतिथि लेखन

बुद्धदेव भट्टाचार्य: संस्कृति और सिनेमा के संरक्षक — संजय मुखोपाध्याय

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।

केशव कुमार भट्टड़ • 28 अगस्त 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement