मालदा का गंगा का कटाव केवल नदी के तट के टूटने की घटना नहीं है। यह इंसानों के सपने टूटने का इतिहास, जड़ें उखड़ने की पीड़ा और अपनी ही जन्मभूमि पर परवासी बन जाने की एक निर्मम कहानी है। यहाँ जब गंगा टूटती है, तो केवल मिट्टी का एक टुकड़ा पानी में नहीं समा जाता, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की यादें, एक बच्चे का सुरक्षित बचपन और एक माँ के अपने परिवार को सहेज कर रखने का आखिरी आशियाना भी ढह जाता है।
गंगा काट रही है जमीन,
उजड़ रहा संसार,
खो रहा बचपन!

* अबिन मित्र * 
एक माँ अपने छोटे से बेटे का हाथ थामे खड़ी है। आँखों के सामने उनका घर धीरे-धीरे गंगा की ओर झुक रहा है। जिस घर में इस बच्चे का जन्म हुआ था, जिस आँगन में उसने घुटनों के बल चलना सीखा था, जिस दीवार से पीठ टिकाकर माँ ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया था, जिस छत के नीचे बारिश की रात में दोनों ने पास-पास लेटकर कहानियाँ सुनी थीं, वही घर आज गंगा की भेंट चढ़ रहा है। माँ नहीं जानती कि अगली रात वह अपने बच्चे को कहाँ सुलाएगी। बच्चा शायद अभी भी यह नहीं समझ पा रहा है कि उसकी दुनिया टूट रही है। वह बस माँ का आँचल पकड़कर पूछता है,
"माँ, हमारा घर कहाँ जाएगा? क्या हम कभी घर वापस नहीं लौटेंगे?"
क्या इस सवाल का कोई जवाब किसी सरकारी दफ़्तर में है? क्या किसी मंत्री के भाषण में है? क्या केंद्र या राज्य सरकार की किसी फ़ाइल में है?
मालदा का गंगा का कटाव केवल नदी के तट के टूटने की घटना नहीं है। यह इंसानों के सपने टूटने का इतिहास, जड़ें उखड़ने की पीड़ा और अपनी ही जन्मभूमि पर परवासी बन जाने की एक निर्मम कहानी है। यहाँ जब गंगा टूटती है, तो केवल मिट्टी का एक टुकड़ा पानी में नहीं समा जाता, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की यादें, एक बच्चे का सुरक्षित बचपन और एक माँ के अपने परिवार को सहेज कर रखने का आखिरी आशियाना भी ढह जाता है।
मालदा के गंगा किनारे के विस्तृत इलाकों के लोगों के लिए बारिश का मतलब ही आतंक है। नदी का जलस्तर बढ़ते ही सीने में सिहरन पैदा हो जाती है। रात के अंधेरे में मिट्टी धंसने की आवाज़ सुनकर नींद उड़ जाती है। कालियाचक-3 ब्लॉक के गोलाप मंडलपाड़ा में एक ही दिन के कटाव में छह परिवारों के घर नदी में विलीन हो गए। खासकोल इलाके में लगभग 50 परिवारों के 300 लोगों को एक स्कूल में ठूँस-ठूँस कर शरण लेनी पड़ी है। मानिकचक के केशरपुर में 282 पीड़ित परिवार आज भी पुनर्वास की उम्मीद में बैठे हैं, यहाँ 'डबल इंजन' सरकार भी विफल साबित हुई है। क्या किसी परिवार का घर उजड़ जाने पर केवल मुआवज़े की रकम से उसकी सारी क्षति की भरपाई की जा सकती है? क्या हाथ में पैसे आते ही ज़मीन तैयार हो जाती है? नया घर बनाने की जगह न होने पर लोग उस पैसे को लेकर कहाँ जाएँगे? स्कूल में शरण लेने वाले बच्चे की पढ़ाई, बुजुर्गों का इलाज, परिवार की आजीविका—इन सबकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या लोगों को बार-बार राहत शिविरों की कतार में खड़ा करके, मुआवज़े के वादे करके और अस्थायी बाँध बनाकर इस संकट का स्थायी समाधान संभव है?
ज़रूरत इस बात की है कि विशेषज्ञों के ज़रिए पूरी तरह से सर्वे कराया जाए, कटाव प्रभावित इलाकों की पहचान कर तत्काल कदम उठाए जाएं। साथ ही, नदी की स्वाभाविक गति और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक पद्धति से नदी के तटों का संरक्षण किया जाए। जो लोग पहले ही सब कुछ गंवा चुके हैं, उनके लिए सुरक्षित ज़मीन पर पुनर्वास, बसासत का अधिकार, पर्याप्त मुआवज़ा, आजीविका की गारंटी और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तथा इलाज की व्यवस्था की जानी चाहिए। सिर्फ घर बनाने के लिए पैसे नहीं, बल्कि घर बनाने के लिए ज़मीन भी देनी होगी। सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि जीवन में दोबारा खड़े होने का अवसर देना चाहिए।
सीपीआई(एम) की यह पुरानी माँग रही है कि गंगा के कटाव को एक स्थानीय समस्या के रूप में न देखकर एक गंभीर राष्ट्रीय आपदा के रूप में लिया जाना चाहिए। केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों से एक वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना तैयार की जानी चाहिए। नदी की प्रकृति और गाद (सिल्ट) जमने का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, नदी तट का आवश्यक संरक्षण, उपयुक्त तकनीक का इस्तेमाल और पर्याप्त धन का आवंटन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
रात गहरी होती जाती है। स्कूल के अंधेरे कमरे में माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर लेटी है। बाहर बारिश हो रही है। नींद में शायद वह बच्चा अभी भी अपने पुराने घर के आँगन में दौड़ रहा है। माँ सो नहीं पा रही है। उसकी आँखों के सामने वही घर तैर रहा है, जो अब कभी वापस नहीं मिलेगा। सुबह उठकर बच्चा फिर वही सवाल पूछेगा, "माँ, हम घर कब चलेंगे?" माँ क्या जवाब देगी? क्या वह कहेगी कि सरकार इंतज़ाम कर रही है? क्या वह कहेगी कि मुआवज़ा मिलते ही नया घर बन जाएगा? या फिर अपने बच्चे की आँखों में देखकर चुपचाप रो पड़ेगी? इस रोने की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? मालदा के लोग भीख नहीं माँगते। वे चाहते हैं कि उनका घर बचे, उनकी ज़मीन बचे और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे। वे नहीं चाहते कि उनके बेटे-बेटी अपनी जन्मभूमि खोकर प्रवासी मजदूरों की तरह अनिश्चित जीवन जीने को मजबूर हों। वे नहीं चाहते कि हर साल बरसात के साथ उनका संसार उजड़ने का डर भी लौट आए। गंगा अपनी स्वाभाविक गति से बहेगी। लेकिन क्या नदी के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन को यूँ ही अनिश्चितता के हवाले छोड़ दिया जाएगा?
मालदा का गंगा कटाव आज इंसानियत को बचाने की लड़ाई है। एक विशाल जनसमूह के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। हज़ारों माताओं के आँसू पोंछने की लड़ाई है। हज़ारों बच्चों के सवालों के जवाब देने की लड़ाई है। इस बहाव में और कितनी माताओं का संसार बहेगा? और कितने बच्चों का बचपन बेघर होगा? और कितने लोगों के आँसुओं के बाद सरकार की नींद खुलेगी?
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(लेखक सीपीआई (एम) केंद्र राज्य सोशल मीडिया के सदस्य हैं)
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