जन समाचार मंच

एसआईआर और सुप्रीम कोर्ट में दायर मामले के संदर्भ में यह बात सीपीआई (एम) के राज्य सचिव और पोलिट ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कही। मंगलवार को बहरमपुर में सीपीआई (एम) मुर्शिदाबाद जिला कमेटी के संगठनात्मक कार्यक्रम में मोहम्मद सलीम शामिल हुए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके साथ सीपीआई (एम) मुर्शिदाबाद जिला के सचिव जामिर मोल्ला भी थे।
उल्लेखनीय है कि आज भी सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर मामले की सुनवाई थी। अगली सुनवाई 17 नवंबर को है। अदालत में आयोग का दावा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों से चर्चा करने के बाद ही ज्ञानेश कुमार आगे बढ़े हैं। वहीं, सुनवाई में आयोग की आंतरिक बैठकों और फाइल नोटिंग्स को सुरक्षित रखने का आवेदन किया गया है।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि पश्चिम बंगाल में आयोग के सीईओ मनोज अग्रवाल थे। चुनाव खत्म होते ही उन्हें मुख्य सचिव बना दिया गया! और मुख्यमंत्री एक पिता के सामने सिर झुकाकर कह रहे हैं कि उन्हीं की दया से वे जीते हैं!
मोहम्मद सलीम ने कहा कि इस बीजेपी, आरएसएस और उनके पिछलग्गुओं ने लोगों को ‘बांग्लादेशी’ और ‘रोहिंग्या’ कहा था। आज देखा जा रहा है कि देश भर में 13 करोड़ लोगों के नाम कटने की कगार पर हैं और पूरा देश आंदोलित है। सिर्फ दिल्ली, मुंबई या कोलकाता ही नहीं, अरुणाचल और लद्दाख में भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियांँ सड़कों पर उतरे हैं। अब कहा जा रहा है कि दिल्ली की सीमा के भीतर कोई जमायत नहीं किया जा सकता। सभा नहीं की जा सकती।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि धर्म और राजनीति अलग-अलग हैं। इज़राइल के भी कई लोग कह रहे हैं कि यहूदी धर्म और द्वेषपूर्ण जायोनवाद (Zionism) एक नहीं हैं। भारत में भी लोग कहेंगे। हिंदू धर्म और राजनीति की सत्ता हथियाने के लिए धर्म का इस्तेमाल करने वाला हिंदुत्ववाद, दोनों एक नहीं हैं।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि लोग अपने घर में या पूजा स्थल पर धर्म का पालन करते हैं। सीपीआई (एम) दफ़्तर के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है।
सीपीआई (एम)मुर्शिदाबाद जिला के सचिव जामिर मोल्ला ने कहा कि एक तरफ़ धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने की राजनीति चल रही है, तो दूसरी तरफ़ लोगों के वोटों की चोरी की जा रही है। रेजीनगर के उपचुनाव में हमने यही देखा। इसके लिए मुख्यमंत्री जिम्मेदार हैं।

टीएमसी के समय मंत्री रहते हुए उन्होंने जो किया, अब 'डबल इंजन' कहकर मुख्यमंत्री बनकर उसका दोगुना कर रहे हैं। हम भाड़ंग की समस्या, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा जैसे लोगों के जीवन और जीविका के मुद्दों पर आंदोलन खड़ा कर रहे हैं।
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साभार:बांग्ला डिजिटल गणशक्ति
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प्रकाशित: 27 अक्टूबर 2026 • 4 मिनट पठन

मालदा का गंगा का कटाव केवल नदी के तट के टूटने की घटना नहीं है। यह इंसानों के सपने टूटने का इतिहास, जड़ें उखड़ने की पीड़ा और अपनी ही जन्मभूमि पर परवासी बन जाने की एक निर्मम कहानी है। यहाँ जब गंगा टूटती है, तो केवल मिट्टी का एक टुकड़ा पानी में नहीं समा जाता, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की यादें, एक बच्चे का सुरक्षित बचपन और एक माँ के अपने परिवार को सहेज कर रखने का आखिरी आशियाना भी ढह जाता है।
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