पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
बुद्धदेव भट्टाचार्य: संस्कृति और सिनेमा के संरक्षक
"राजनीति के गलियारों में रहते हुए भी जिन्होंने आम जनता की सांस्कृतिक चेतना को निखारने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।"
— संजय मुखोपाध्याय
दिवंगत जननेता बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति लगाव किसी मिसाल से कम नहीं था। सिनेमा प्रेमी (खासकर बंगाली) उनके जितने आभारी हैं, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। बुद्धदेव जी स्वभाव से काफी शर्मीले इंसान थे, इसलिए वे कभी अपनी तारीफों के पुल नहीं बांधते थे। आइए, उनकी जिंदगी के एक ऐसे ही दिलचस्प किस्से से शुरुआत करते हैं।
अस्सी के दशक की बात है। उस समय उनकी पार्टी के राज्य कार्यालय को अलीमुद्दीन स्ट्रीट के पुराने मकान नंबर 33 से बदलकर पास ही स्थित 31 नंबर मकान में शिफ्ट किया जा रहा था। सारा फर्नीचर वहां भेजा जा चुका था। सुबह के समय बुद्धदेव जी बचे हुए जरूरी कागजों को खंगाल रहे थे, ताकि कोई जरूरी पुराना दस्तावेज छूट न जाए। तभी अचानक उनके हाथ कुछ फटे-पुराने पन्ने लगे। सिर्फ कुछ पन्ने पढ़ते ही वे समझ गए कि यह कोई मामूली कागज नहीं, बल्कि एक बेहद कीमती ऐतिहासिक दस्तावेज है।
इसके लेखक उस दौर में पार्टी के सदस्य रहे महान फिल्मकार ऋत्विक कुमार घटक थे। शायद इसे पार्टी नेता प्रमोद दासगुप्ता के विचार के लिए तैयार किया गया था। बुद्धदेव जी ने तुरंत उन कागजों को संभालकर अलग रख लिया ताकि वे फिर कभी लोगों की नजरों से ओझल न हो जाएं। इसके बाद उन्होंने ऋत्विक जी की पत्नी सुरमा घटक को बुलवाकर कहा, "यह आपके ऋत्विक मेमोरियल ट्रस्ट के लिए बहुत अनमोल दस्तावेज है। इसे संभालकर रखिएगा।" सुरमा घटक ने बड़े आदर और आभार के साथ उसे स्वीकार किया और बाद में उस 'कल्चरल थीसिस' को एक किताब के रूप में छापा।
90 के दशक में जब शिकागो यूनिवर्सिटी की एरिन एलिजाबेथ ओ'डोनेल नाम की एक युवती जादवपुर में मेरे पास रिसर्च करने आई, तो मैंने उससे इस दस्तावेज का अंग्रेजी अनुवाद करने को कहा। आज पार्टी के भीतर सांस्कृतिक सोच और दिशा के इतिहास को दर्ज करते समय यह दस्तावेज एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है। उस दिन अगर बुद्धदेव जी ने खुद पहल न की होती, तो यह पूरा अध्याय हमेशा के लिए गुमनामी के अंधेरे में खो जाता।
आगे चलकर जब बुद्धदेव जी के प्रयास, सत्यजीत राय की प्रेरणा और काफी हद तक गौतम घोष की रुचि से 'रूपकला केंद्र' की शुरुआत हुई, तो उन्होंने कुछ समय के लिए इस संस्थान की जिम्मेदारी मुझे सौंपी। मैंने मुख्यमंत्री बुद्धदेव जी से गुजारिश की कि अगर कोई बड़े निर्देशक हमारे छात्रों को स्क्रीनप्ले लिखने से लेकर फिल्म पूरी होने तक की प्रैक्टिकल वर्कशॉप दें, तो बच्चों को किताबी ज्ञान से परे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। लेकिन जो हुआ, उतनी बड़ी बात का अंदाजा तो मुझे भी नहीं था। मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत आग्रह पर चिली के विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मिगुएल लिटिन हमारे छात्रों को ट्रेनिंग देने रूपकला के स्टूडियो पहुंचे। मिगुएल लिटिन अंग्रेजी में सहज नहीं थे, इसलिए बातचीत और पढ़ाई के लिए एक अनुवादक (दुभाषिए) का इंतजाम किया गया। बुद्धदेव जी के अलावा भला कौन सा नेता आम और साधारण परिवारों के बच्चों के लिए इतनी दरियादिली से मदद का हाथ आगे बढ़ाता?
साल 2004 की बात है। जादवपुर यूनिवर्सिटी के फिल्म स्टडीज विभाग के छात्रों ने अपने कोर्स के तहत बनाई गई फिल्मों की एक स्क्रीनशॉट प्रदर्शनी यूनिवर्सिटी के के. पी. बोस मेमोरियल हॉल में रखी। मैं उस समय विभाग का अध्यक्ष था। 'नंदन' में बातचीत के दौरान मैंने बुद्धदेव जी को इस आयोजन की जानकारी दी और उनसे इसका उद्घाटन करने का अनुरोध किया। हल्के-फुल्के अंदाज में मुझे डांटते हुए उन्होंने कहा, "अब मैं राइटर्स (सचिवालय) छोड़कर दोपहर 12 बजे तुम्हारी फिल्में देखने जाऊं?" लेकिन तुरंत ही बोले, "तुम कल राइटर्स में मेरे सचिव को खबर दे आना। वक्त मिला तो आ जाऊंगा, पर उद्घाटन नहीं कर पाऊंगा।" उनकी आवाज में कोई सख्ती न देखकर मैंने मान लिया कि वे नहीं आएंगे। मुझसे बहुत बड़ी चूक हो गई और मैंने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर (कुलपति) अशोकनाथ बोस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी। लेकिन चमत्कार देखिए! प्रदर्शनी वाले दिन दोपहर 12 बजे से ठीक पहले जादवपुर थाने की पुलिस कैंपस में आ पहुंची। थोड़ी देर में थानेदार ने खुद बताया कि मुख्यमंत्री का काफिला पार्क स्ट्रीट पार कर चुका है। आनन-फानन में कुलपति को मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए दौड़ना पड़ा।
आते ही बुद्धदा ने छात्रों का दिल जीत लिया। बिना कोई औपचारिक भाषण दिए, वे आगे की कुर्सी पर बैठे और दो शॉर्ट फिल्में देखीं। इसके बाद उन्होंने प्रोजेक्टर रोकने को कहा और बड़ी विनम्रता से बोले कि सचिवालय में उनका बेहद जरूरी काम पेंडिंग है, इसलिए उन्हें निकलना होगा। पर जाने से पहले वे छात्रों के साथ सिनेमा पर थोड़ा 'अड्डा' (चर्चा) करना चाहते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है, बुद्धदा ने छात्रों से पूछा कि फिल्म निर्देशक बर्गमैन की मशहूर फिल्म "विंटर लाइट" की दार्शनिक सोच के पीछे मूल रूप से किस चिंतक का विचार काम कर रहा था। मुख्यमंत्री के इस अचानक सवाल पर छात्र थोड़े हिचकिचा गए। तब बुद्धदा ने खुद ही सोरेन किर्केगार्ड और उनके 'अस्तित्ववाद' (Existentialism) पर करीब तीन मिनट तक बड़ी बेबाकी से बात की। इसके बाद वे छात्रों के साथ अनौपचारिक अंदाज में चार्ली चैपलिन की फिल्म 'मॉन्सिअर वर्डौक्स' (Monsieur Verdoux) पर चर्चा करने लगे। समय का पता ही नहीं चला। लगभग 40 मिनट बिताने के बाद मुख्यमंत्री खड़े हुए। जाने से पहले उन्होंने वीसी और सभी प्रोफेसरों को हैरान करते हुए यह बड़ा ऐलान किया कि यूनिवर्सिटी की फिल्में बनाने का सरकारी बजट राज्य सरकार दोगुना कर देगी और इसका सरकारी पत्र जल्द ही पहुंच जाएगा। इस शानदार तोहफे की तो हमने कल्पना भी नहीं की थी!
जब वे नंदन सिनेमा हॉल की तीसरी मंजिल पर बैठकर फिल्में देखते थे, वहीं से अपनी बेबाक सोच और अदम्य साहस के साथ फैसला करते थे कि कोलकाता फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन तारकोवस्की की महान फिल्म "मिरर" से होगा। उन्होंने आम जनता की सिनेमाई समझ और पसंद को निखारने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। आज वे हमारे बीच नहीं रहे। हम कभी समझ ही नहीं पाए कि राजनीति की व्यस्तताओं और दांव-पेचों के बीच भी उनकी पैनी नजरें हमेशा सिनेमा और कला की रोशनी को परख लेती थीं।
जब मशहूर सिनेमैटोग्राफर सुब्रत मित्र ने नंदन के प्रोजेक्शन सिस्टम की थोड़ी आलोचना की, तो बुद्धदा ने बिना किसी ऐतराज के उसे शांत रहकर सुना और डायरेक्टर को सुधार के लिए नोट्स लेने को कहा। फेस्टिवल के उद्घाटन के बाद, वे इस बात का तुरंत इंतजाम कर देते थे कि व्यस्त मुख्यमंत्री ज्योति बसु के साथ 'जिलो पोंटेकोर्वो' जैसे राजनीति से गहराई से जुड़े निर्देशक इटैलियन फासीवाद पर व्यक्तिगत चर्चा कर सकें। साथ ही, उनका यह सख्त निर्देश भी होता था कि फिल्म की पढ़ाई कर रहे छात्रों को बिना किसी फीस (डेलीगेट पास) के सम्मानपूर्वक न्योता दिया जाए।
आज यह सब एक खूबसूरत सपने जैसा लगता है। मैं उनके एक बहुत ही छोटे और आम प्रशंसक के तौर पर, उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए शेक्सपियर के नाटक से मार्क एंटनी द्वारा ब्रूटस की मृत्यु पर कहे गए इन ऐतिहासिक शब्दों को चुनूंगा:
"His life was gentle; and The elements so mix'd in him, that Nature might stand up And say to all the world: This was a man!"
(उनका जीवन सौम्य था; और उसमें गुण इस प्रकार घुले-मिले थे कि प्रकृति स्वयं खड़ी होकर पूरी दुनिया से कह सकती थी: 'यह एक सच्चा इंसान था!')

प्रो. संजय मुखोपाध्याय (Sanjoy Mukhopadhyay) भारत के प्रख्यात फिल्म विद्वान, निबंधकार और सांस्कृतिक आलोचक हैं। वह जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के फिल्म अध्ययन विभाग (Department of Film Studies) के संस्थापक अध्यक्ष तथा 'स्कूल ऑफ मीडिया, कम्युनिकेशन एंड कल्चरल स्टडीज' के पूर्व निदेशक रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार के फिल्म निर्माण संस्थान 'रूपकला केंद्र' के निदेशक और सीईओ (CEO) के रूप में भी सेवाएं दी हैं। सिनेमाई इतिहास, बांग्ला संस्कृति और सत्यजीत राय एवं ऋत्विक घटक के सिनेमा पर उनके आलोचनात्मक लेखन को अकादमिक जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
आलेख साभार: बांग्ला साप्ताहिक 'देशहितैषी' 06.09.2024 पेज:7
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