वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
विकल्प की डिजिटल दुनिया
अतिथि लेखन

मृणाल सेन और कलकत्ता : डॉ अशोक सिंह

श्रेया जायसवाल14 मई 20265 मिनट पठन89 बार पढ़ा गया

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।

 

.

.

मृणाल सेन के जन्मदिन पर श्रद्धांजलि।

मृणाल सेन और कलकत्ता 

-डॉ. अशोक सिंह

.

ज अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म निर्देशक मृणाल सेन का 104 वाँ जन्मदिन है। ऋत्विक घटक,सत्यजित राय और मृणाल सेन ने भारतीय सिनेमा को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलायी। 

ऋत्विक घटक की फिल्मों में विस्थापन एक महाकाव्य की तरह दिखायी पड़ता है। उनकी फिल्म "बाड़ी थेके पालिए "में उनके जीवन का सपना सिनेमा के पर्दे पर हकीकत में बदल जाता है। अपनी जन्मभूमि बांग्लादेश से बिछड़ने का दर्द उनकी फिल्मों में बार -बार दिखायी पड़ता है। "तितास एकटी नदीर नाम "फिल्म में बांग्लादेश की नदियाँ, धान के खेत,वहाँ के लोकगीत एक जबर्दस्त नास्टालजिया पैदा करते हैं।उन्हें भारतीय सिनेमा के जीनियस के रूप में याद किया जाता है।

"जुक्ति तक्को आर गप्पो "पूरी तरह से राजनीतिक फिल्म है। इस पूरी फिल्म में वे एक घर की तलाश करते हैं। कलकत्ता के एक कमरे से निकलकर वे अपनी शिक्षक पत्नी और बेटे से मिलने के लिए केवल एक रात वहाँ ठहरते हैं। उनके साथ बांग्लादेश से शरणार्थी बनकर आयी एक युवती (सांवली मित्र)है,जिसे वे "माँ "संबोधित करते हैं। लौटते समय जंगल में कुछ नक्सलवादी युवकों से मुलाकात और लम्बी बहस होती है। भारतीय सिनेमा के सत्तर के दशक को समझने के लिए यह दृश्य सबसे महत्वपूर्ण है। वे उन युवकों से कहते हैं कि उनका रास्ता सही नहीं है। पुलिस और नक्सली युवकों के बीच संघर्ष में पुलिस की गोली से उनकी मृत्यु होती है। जीवन की बिडम्बना देखिए भारतीय सिनेमा के जीनियस के पास जीवन के अंत तक अपना घर नसीब नहीं हुआ।

"बाड़ी थेके पालिए "उनके जीवन का सपना है,जो सिनेमा के पर्दे पर जीवंत हो उठता है। अपने पिता की डाँट खाकर एक बच्चा गाँव से कलकत्ता आता है। वह अपनी आँखों से महानगर को देखता है.बच्चे द्वारा कलकत्ता को देखे जाने का दृश्य "तारे जमीन पर "फिल्म में दिखता है। कलकत्ता की जगह बम्बई है।भूख से व्याकुल यह बच्चा कलकत्ता के डलहौसी इलाके में घूम रहा है। एक सत्तू बेचनेवाले ने बच्चे को बुलाकर बड़े प्रेम से सत्तू खिलाया।सत्तू बेचनेवाला बिहार के एक गाँव से शहर में कमाने आया है।दोनों ही विस्थापित हैं ।कलकत्ता का मानवीय चेहरा इस फिल्म में पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।

सत्यजित राय की फिल्मों में कलकत्ता की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। कलकत्ता का मानवीय और प्रतिवादी चेहरा पूरी गरिमा के साथ उपस्थित है। 

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।भारतीय सिनेमा में संभवतः यह विरल घटना है। बंगाल के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मध्यम वर्ग नेतृत्व की भूमिका में है."कलकत्ता 71"नाम से उनकी अविस्मरणीय फिल्म है। आजादी के पहले और बाद में भुखमरी की समस्या पर यह फिल्म है। 1980 के आसपास उनकी दो फिल्मों "एक दिन प्रतिदिन "और "खारिज" ने बंगाल के मध्यवर्ग को बेचैन कर दिया था। "एक दिन प्रतिदिन "में एक निम्नमध्यवर्गीय बंगाली परिवार की एकमात्र नौकरी करनेवाली युवती के रात तक घर न लौटने की कहानी है। पूरी रात कलकत्ता शहर महत्वपूर्ण हो उठता है। सुबह घर लौटने पर पड़ोसियों की उत्सुकता के बीच घरवाले उससे सवाल -जवाब नहीं करते। यह फिल्म नारी मुक्ति का दस्तावेज़ है। दूसरी फिल्म "खारिज "में" कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में गाँव से आया एक गरीब बच्चा घरेलू नौकर है जिसकी रात में रसोई घर में सोते समय मौत हो जाती है. महानगर के मध्यवर्गीय जीवन के खोखलेपन को यह फिल्म बेपर्दा कर देती है।

मृणाल सेन का सबसे मशहूर फोटो कलकत्ता की सबसे खूबसूरत सड़क रेड रोड (इंदिरा गाँधी सरणी) का है। जहाँ वे सड़क पर लेटे हुए निर्देशन दे रहे हैं। एक बार एक विदेशी को उन्होंने कहा था कि कलकत्ता का असली चेहरा देखना है तो ब्रिगेड परेड ग्राउंड चले जाओ। उस दिन ब्रिगेड में सी पी आई (एम)की जनसभा थी। 

मृणाल सेन मानते थे कि सिनेमा के पर्दे पर सच को अगर दिखा दिया जाये तो आग लग जाएगी। भारत में फिल्म सोसाइटी आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व दिया था। अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में उन्होंने देश का मान बढ़ाया। वे अपने को सबसे पहले सिनेमा का दर्शक मानते थे। 90 वर्ष की उम्र में निर्देशक अनीक दत्त की बहुचर्चित फिल्म "भूतेर भविष्यत" 'नंदन' में जाकर देखी थी। फिल्म देखने के बाद उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में अब तक शायद ऐसी फिल्म नहीं बनी है। 

मृणाल सेन से मेरी दो बार मुलाकात हुयी थी। पहली बार 11 फरवरी1989 को कलामंदिर के बाहर ऊषा गांगुली के साथ काफी देर तक उनसे बात हुयी. 'आरंभ' और 'रंगकर्मी 'द्वारा आयोजित सफदर हाशमी मेमोरियल कलकत्ता हिन्दी नाट्य महोत्सव के सप्ताहव्यापी आयोजन का उद्घाटन करते के लिए वे आए थे।यह आयोजन मुख्यतः सात महीने पहले कलकत्ता के हिन्दीभाषी विद्यार्थियों की संस्था 'आरंभ' की पहल पर हुआ था. मृणाल सेन कलकत्ता और उसके आसपास के हिन्दीभाषी समाज की सांस्कृतिक गतिविधियों पर संवाद कर रहे थे।दूसरी बार नंदन 'में राज्यसभा के सांसद मोहम्मद सलीम के साथ उनसे मिला।मृणाल सेन उस समय राज्यसभा के सदस्य थे. सांसद मोहम्मद सलीम के लिखित प्रस्ताव पर 1998में 'नंदन' ने पहली बार प्रेमचंद जयंती मनायी थी।मृणाल सेन ने उसका उद्घाटन किया था।

ममता बनर्जी की तानाशाही सरकार का उन्होंने जीवन की अंतिम साँस तक विरोध किया। मरने के बाद भी उनकी वसीयत में लिखा था कि उनकी अंतिम यात्रा में सरकार के किसी प्रतिनिधि  को शामिल नहीं किया जाय।जीवन भर प्रतिवादी रहे मृणाल सेन की मृत्यु के बाद उनके सबसे प्रिय पात्र कलकत्ता महानगर ने उनके प्रतिवाद को श्रद्धांजलि दी।

मृणाल सेन अमर रहें!

अपलोडर: श्रेया जायसवाल

विज्ञापन
और पढ़ें
सभी देखें →
अतिथि लेखन

रवींद्रनाथ, फासीवाद और लाल पार्टी - मयूख विश्वास

आज 9 मई भी है, वह दिन जब विश्व मानवता को फासीवादी तांडव से मुक्ति मिली थी। इस संदर्भ में बंगाल की फासीवाद-विरोधी परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हमारे रवींद्रनाथ ठाकुर इस विरासत के साथ ओत-प्रोत रूप से जुड़े हुए हैं।

श्रेया जायसवाल09 मई 2026

अतिथि लेखन

तर्क के खिलाफ 'गोली': दाभोलकर हत्याकांड . कट्टरपंथ की 'भयभीत करने की राजनीति' को हराना ही होगा - शांतनु बंद्योपाध्याय

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

केशव कुमार भट्टड़25 मई 2026

अतिथि लेखन

कोयला उद्योग के ठेका मजदूर - बिरजू यादव

ठेका श्रमिकों ने अपनी श्रमशक्ति के बल पर ही कोल इंडिया को महारत्न कंपनी बनाया है। लेकिन आज ये ठेका श्रमिक स्वयं को उपेक्षित और अवहेलित महसूस कर रहे हैं। इनकी वास्तविक स्थिति अत्यंत दयनीय है। हमारे देश में उदारीकरण का युग शुरू होने के बाद से ही देश के प्रत्येक सार्वजनिक उपक्रम की उत्पादन प्रक्रिया में ठेका प्रथा (Contract System) का प्रचलन बढ़ा है। कोयला उद्योग भी इसका अपवाद नहीं है। इस उद्योग में भी बड़ी संख्या में ठेका श्रमिकों को उत्पादन प्रक्रिया में नियुक्त किया गया है। शुरुआती दौर में इसकी गति धीमी थी, लेकिन बहुत कम समय में इसने व्यापक रूप ले लिया है।

श्रेया जायसवाल09 जून 2026