ठेका श्रमिकों ने अपनी श्रमशक्ति के बल पर ही कोल इंडिया को महारत्न कंपनी बनाया है। लेकिन आज ये ठेका श्रमिक स्वयं को उपेक्षित और अवहेलित महसूस कर रहे हैं। इनकी वास्तविक स्थिति अत्यंत दयनीय है। हमारे देश में उदारीकरण का युग शुरू होने के बाद से ही देश के प्रत्येक सार्वजनिक उपक्रम की उत्पादन प्रक्रिया में ठेका प्रथा (Contract System) का प्रचलन बढ़ा है। कोयला उद्योग भी इसका अपवाद नहीं है। इस उद्योग में भी बड़ी संख्या में ठेका श्रमिकों को उत्पादन प्रक्रिया में नियुक्त किया गया है। शुरुआती दौर में इसकी गति धीमी थी, लेकिन बहुत कम समय में इसने व्यापक रूप ले लिया है।
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जन समाचार मंच
कोयला उद्योग के ठेका मजदूर - बिरजू यादव
कोयला उद्योग के ठेका मजदूर
• बिरजू यादव
ई.सी.एल, झांझरा एरिया के ठेका मजदूर पिछले कई दिनों से हाइ पावर कमेटी (HPC) अनुमोदित वेतन सहित अन्य माँगों के लिए हड़ताल पर हैं। पिछले कई वर्षों से उन्हें उनके वाजिब वेतन से वंचित रखा गया था। उनके इस लड़ाई का हम पूर्ण रुप से समर्थन करते हैं।
आप सभी निश्चित ही अवगत हैं कि हमारे देश में ऊर्जा का मुख्य स्रोत कोयला है। इसका मुख्य उत्पादक 'कोल इंडिया लिमिटेड' देश की सबसे बड़ी महारत्न कंपनी है। इसे केंद्र सरकार द्वारा 2008 में नवरत्न और 2011 में महारत्न कंपनी का दर्जा दिया गया था। इससे पहले यह एक मिनी-रत्न कंपनी के रूप में जानी जाती थी। कोल इंडिया लिमिटेड की मिनी-रत्न से महारत्न तक की इस लंबी यात्रा में कोयला श्रमिकों, विशेषकर कोयला उद्योग में कार्यरत ठेका श्रमिकों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
निर्विवाद है कि इन ठेका श्रमिकों ने अपनी श्रमशक्ति के बल पर ही कोल इंडिया को महारत्न कंपनी बनाया है। लेकिन आज ये ठेका श्रमिक स्वयं को उपेक्षित और अवहेलित महसूस कर रहे हैं। इनकी वास्तविक स्थिति अत्यंत दयनीय है। हमारे देश में उदारीकरण का युग शुरू होने के बाद से ही देश के प्रत्येक सार्वजनिक उपक्रम की उत्पादन प्रक्रिया में ठेका प्रथा (Contract System) का प्रचलन बढ़ा है। कोयला उद्योग भी इसका अपवाद नहीं है। इस उद्योग में भी बड़ी संख्या में ठेका श्रमिकों को उत्पादन प्रक्रिया में नियुक्त किया गया है। शुरुआती दौर में इसकी गति धीमी थी, लेकिन बहुत कम समय में इसने व्यापक रूप ले लिया है।
कोयला उद्योग में जब से ठेका प्रथा शुरू हुई है, तभी से हमारा संगठन 'खदान ठेका मजदूर सभा' (सी.आई.टी.यू.) ठेका श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायसंगत लड़ाई लड़ता आ रहा है। शुरुआत में कोयला उद्योग के ठेका श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। धीरे-धीरे संगठित श्रमिक आंदोलन के परिणामस्वरूप, हमारा संगठन ठेका श्रमिकों की कुछ बुनियादी और जायज माँगें मनवाने में सफल रहा। जैसे—ठेका श्रमिकों को वी.टी. (VT) ट्रेनिंग दिलाना, बी-फॉर्म और सी-फॉर्म में उपस्थिति दर्ज कराना; यह सब संगठित आंदोलन के कारण ही संभव हो पाया है।
ठेका श्रमिकों के सम्मानजनक वेतन और अन्य जायज मांगों को लेकर अकेले संगठित किया गया कोई भी आंदोलन अधिकारियों पर विशेष प्रभाव नहीं डाल पा रहा था। हमारे संगठन की ओर से सभी श्रमिक संगठनों को एकजुट कर एक संयुक्त और जोरदार आंदोलन शुरू किया गया। निरंतर लड़ाई और संघर्ष के परिणामस्वरूप, कोल इंडिया लिमिटेड ठेका श्रमिकों के न्यायसंगत वेतन और अन्य सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए 'हाई पावर कमेटी' गठित करने पर मजबूर हुई (जैसा कि स्थायी श्रमिकों के वेतन निर्धारण के लिए JBCCI कमेटी होती है)। इस हाई पावर कमेटी की कई बैठकों के बाद, अधिकारियों को कमेटी की सिफारिशें माननी पड़ीं और ठेका श्रमिकों के लिए वेतन समझौता करना पड़ा। इसी के आधार पर 18 फरवरी 2013 को एक आदेश जारी हुआ, जिसके अनुसार सभी कोयला उपक्रमों में ठेका श्रमिकों के लिए यह वेतन समझौता 1 जनवरी 2013 से लागू किया गया।
इस नीति के अनुसार, संबंधित राज्य सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन और कोल इंडिया लिमिटेड में कार्यरत स्थायी श्रमिकों के न्यूनतम वेतन को जोड़कर, उसका आधा हिस्सा ठेका श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन के रूप में निर्धारित किया गया। इसके अनुसार अकुशल (Unskilled) श्रमिक: 494 रुपये, अर्ध-कुशल (Semi-skilled) श्रमिक: 494 रुपये, कुशल (Skilled) श्रमिक: 524 रुपये,अति-कुशल (Highly Skilled) श्रमिक: 554 रुपये(यह मूल वेतन था, इसके अलावा DA, SDA और अटेंडेंस बोनस—जो बेसिक का 10% है—और चिकित्सा सुविधा देने का निर्णय लिया गया)।
इसके बाद कोल इंडिया अधिकारियों द्वारा समय-समय पर बढ़ा हुआ DA प्रदान करने के लिए सर्कुलर जारी किए जाते हैं। लेकिन ये तमाम सुविधाएं केवल कागजी प्रक्रियाओं और सर्कुलर तक ही सीमित हैं। वास्तव में कार्यरत ठेका श्रमिक इन सुविधाओं से वंचित हैं। इसके बाद फिर से कोल इंडिया लिमिटेड और श्रमिक प्रतिनिधियों के बीच एक नया वेतन समझौता हुआ। फलस्वरूप, कोल इंडिया ने 9 अक्टूबर 2018 को बढ़ा हुआ वेतन ढांचा लागू करने का आदेश जारी किया। उसके अनुसार अकुशल श्रमिक को 787 रुपये, अर्ध-कुशल को 817 रुपये, कुशल को 847 रुपये और अति-कुशल श्रमिक को 877 रुपये वेतन मिलना तय हुआ।
स्थायी श्रमिकों के लिए हुए 11वें JBCCI समझौते के बाद, ठेका श्रमिकों के लिए संबंधित कमेटी के निर्णय और कोल इंडिया के वर्तमान सर्कुलर के अनुसार, आज एक ठेका श्रमिक का (मूल वेतन + DA सहित) प्रतिदिन का प्राप्य वेतन ,अकुशल: 1320 रुपये,अर्ध-कुशल: 1354 रुपये, कुशल: 1387 रुपये, अति-कुशल: 1421 रुपये। कोयला प्रबंधनों द्वारा जारी विभिन्न निविदाओं (Tenders) में यह वेतन ढाँचा लिखा होता है, इसके बावजूद ठेका श्रमिकों को यह राशि नहीं मिल रही है। उन्हें उनके निर्धारित वेतन से वंचित किया जा रहा है।
कोयला उद्योग में स्थायी श्रमिकों की संख्या लगातार घट रही है, लेकिन उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2021-22 में देश में कुल 778.19 मिलियन टन कोयला उत्पादन हुआ था, जिसमें अकेले कोल इंडिया लिमिटेड ने 622.63 मिलियन टन उत्पादन किया। इसी तरह वित्तीय वर्ष 2023-24 में कोल इंडिया ने अकेले 773.64 मिलियन टन कोयला उत्पादन किया। कोयला कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के लिए आउटसोर्सिंग कंपनियों के माध्यम से ठेका श्रमिकों को बड़े पैमाने पर लगा रही हैं।कोयला उद्योग में यह कड़वा सच है कि उत्पादित कोयले का लगभग दो-तिहाई 65-70% से अधिक हिस्सा ठेका श्रमिकों द्वारा निकाला जाता है।
ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) में भी स्थायी श्रमिकों की संख्या भारी कमी आई है; इतना ही नहीं, विभागीय उत्पादन पद्धति की अनदेखी की जा रही है। लेकिन उत्पादन बढ़ रहा है—पिछले वित्तीय वर्ष में ECL ने लगभग 46 मिलियन टन कोयला उत्पादन किया। हमारी ECL कंपनी में भी उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी संख्या में ठेका श्रमिक लगे हुए हैं, लेकिन अभी तक वे अपने उचित और निर्धारित वेतन ढांचे से वंचित हैं। ठेकेदार अपनी मर्जी से वेतन देकर इन श्रमिकों का शोषण करते हैं। यदि कोई ठेका श्रमिक इसका विरोध करता है या आवाज उठाता है, तो उसे तुरंत काम से निकाल दिया जाता है या काम बंद करने की धमकी दी जाती है, जो कि पूरी तरह अवैध है। ठेका श्रमिकों के उनके प्राप्त हक उन्हें दिलाने हेतु कोयला उद्योग से समस्त मजदूरों कै साथ आकर आन्दोलन करने की जरूरत है।
ई.सी.एल, झांझरा एरिया के ठेका मजदूरों ने दिशा दिखाया है। अब पूरे ई.सी.एल के ठेका मजदूर उसी दिशा में कदम बढाना शुरू कर दिया ह़ै।
ले मशालें चल पड़े हैं,
लोग मेरे गाँव के।
अब अँधेरा जीत लेंगे,
लोग मेरे गाँव के।।
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{लेखक खदान ठेकेदार मजदूर सभा (सीटू) के संयुक्त सचिव हैं}
अपलोडर: श्रेया जायसवाल
कोयला उद्योग के ठेका मजदूर - बिरजू यादव
अपलोडर: श्रेया जायसवाल• प्रकाशित: 09 जून 2026 • 6 मिनट पठन
