शतवर्षीय उत्तम कुमार
~अकेला आता है चाँद~
~संजय मुखोपाध्याय~
"बुद्धिजीवियों के बौद्धिक संदेहों को पीछे छोड़ते हुए, जो लोकप्रियता के आसमान पर अकेले चमके—वही उत्तम हैं।"
“बंगाली बुद्धिजीवियों ने आज तक उत्तमकुमार को लेकर कभी कोई खास बौद्धिक चिंता नहीं की है। इसका एक बड़ा कारण यह नहीं है कि फिल्म को कला के रूप में कमतर या गैर-संभ्रांत माना जाता है, बल्कि यह है कि वे लोकप्रियता के सौंदर्यशास्त्र को लेकर मन ही मन एक गहरे संशय और अविश्वास से भरे रहते हैं। “
शतवर्षीय उत्तम कुमार:
बांग्ला सिनेमा का ध्रुवतारा
दमयंती ने देखा कि उनके शरीर पर पसीना नहीं था, आँखें बिना पलक झपकाए स्थिर थीं और शरीर की कोई छाया नहीं थी। उनकी मालाएँ मुरझाई हुई नहीं थीं, अंगों पर धूल नहीं थी और वे धरती को छुए बिना बैठे थे। केवल एक व्यक्ति में देवताओं जैसे ये सभी लक्षण नहीं थे; यह देखकर दमयंती समझ गईं कि वही नल हैं।
(महाभारत: राजशेखर बसु के सारानुवाद से)
इह लोक में, इस दुनिया में वही उत्तम कुमार हैं। प्रमथेशचंद्र बरुआ से लेकर सौमित्र चटर्जी तक— सभी छद्मवेशी देवता हैं। यहीं से कहानी को अपने हाथ में लेने और उसे बदलने की हमारी जिम्मेदारी शुरू होती है।
कोलकाता के एक टीवी चैनल के विज्ञापन में कुछ ही दिन पहले मैंने देखा था— ‘उत्तम के बिना सुचित्रा नहीं होती’। जाहिर है, विज्ञापन की परोक्ष नायिका या प्रतिद्वंद्वी को गौण करने की धुन में यह ध्यान ही नहीं रहता कि वास्तव में इतिहास के अलावा उत्तम कुमार की कोई स्थायी संगिनी है ही नहीं। न सुचित्रा, न सुप्रिया और माधवी, न अपर्णा और न ही अरुंधती। हालाँकि लोकश्रुति के अनुसार सितारे हमेशा दल बाँधकर आते हैं। और दृश्यों का इतिहास कोई हॉलीवुड से थोड़ी शुरू हुआ है, वह तो हड़प्पा से भी पुराना है। हमारे जो बुद्धिजीवी थोड़े रिचर्ड डायर, थोड़े पीटर ब्रुक और कुछ-कुछ राज कपूर के रंग में रंगे सांस्कृतिक नशे में डूबे रहते हैं, वे भारतीय कथा-शैलियों और आख्यानों में 'मिलन और पुनर्रविवाह' के तत्व न तलाश पाने पर बार-बार स्टैनली कैवेल जैसे उस्तादों की शरण में जाते हैं। और यह समरूपता का आकर्षण तथा नेहरू मॉडल एक ऐसा खतरनाक घेरा है, जिससे यह एहसास ही नहीं होता कि हमारे युवाओं की शहर में घूमने-फिरने की दिनचर्या आजादी से बहुत पहले की है। पाउंड के अवमूल्यन के बाद जो बंगाली युवा कलकत्ता की गलियों और नुक्कड़ों को छानता फिरता था , उसका मिजाज राज कपूर के आवारा से बिल्कुल अलग था। असल में, जब लोकप्रियता की विचारधारा उत्तम कुमार नाम की परिघटना को अपने दायरे में समेटना चाहती है, तब वह नकल की हड़बड़ी में यह समझना ही नहीं चाहती कि बंगाल का इतिहास एकदम अलग है। प्रबोधन की सीमा चाहे जितनी छोटी रही हो, बंगाल के पास अपनी उन्नीसवीं सदी है, जो देश के बाकी हिस्सों में नहीं है। और संक्षेप में कहें तो साहिबी मेलोड्रामा के नीले नक्शे को भी उत्तम के चरित्र-मानस पर इतनी आसानी से नहीं थोपा जा सकता।

नहीं, विनय मजूमदार के प्रति अपना ऋण स्वीकार करते हुए कहा जा सकता है कि हम किसी विदेशी भाषा में बात करने की तरह ही बेहद सावधानी के साथ उत्तम के प्रसंग पर पहुँचते हैं। वह साठ का दशक खत्म हो रहा था। एक दोपहर उत्तम कुमार सलिल दत्त की फिल्म 'अपरिचित' में अपर्णा सेन की तरफ एकदम स्थिर, दीर्घ और अपलक नजरों से देख रहे थे। उस एक लंबे दृश्य में वह पल मानो अमरता की ओर ढल गया। पाप और पुण्य के बीच का मद्धम प्रकाश उनकी आँखों में चमक उठा था। स्वर्ग पाने का लालच सिद्धार्थ भी भूल गया था— जीवनानंद की मदद के बिना ही हम यह समझ सकते हैं कि मिड-क्लाज-अप (mid-close up) के अर्थ की परतें एकांत नरक की ओर बढ़ते उत्तम के चेहरे की रेखाओं में एक स्तर से दूसरे स्तर तक फैलती जा रही हैं। कभी मोनिका के साथ गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने के दौरान गोदार समेत पूरी फ्रेंच न्यू वेव (New Wave) ने बर्गमैन की नायिका हैरियट एंडरसन के देखने के एक लंबे शॉट (लॉन्ग टेक) से आधुनिक यथार्थवाद की खूबी को खोज निकाला था। उत्तम कुमार की यह ठहरी हुई दृष्टिरेखा एक पल का इस्तेमाल करके आगे बढ़ने के बजाय नीचे गिरने यानी पतन को चुनती है। बहुत बाद में मुझे समझ आया कि उत्तम कुमार शायद अनजाने में ही आधुनिकता के अपने ही इलाके में दाखिल हो चुके थे। यही तो नैतिकता का पूरा ताना-बाना है। पाप और पुण्य, भला और बुरा सब एक जैसे हैं। सच को जानने-समझने में अशुभ अंततः एक गलत चुनाव साबित होता है। या फिर और अधिक परिपक्व समझ के साथ बाद के उत्तम कुमार पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि वे पटकथा से भी बहुत आगे निकल चुके हैं; कहानी का नाटकीय मकसद चाहे जितना कमजोर हो, उत्तम कुमार अपने अभिनय के अंदाज को उससे पूरी तरह अलग कर लेते हैं। वे खुद को इतने हद तक अलग कर सकते हैं कि 'विकेले भोरेर फूल' या 'दुई पृथिवी' जैसी फिल्मों में उन्हें अचानक 'कास्टिंग एरर' भी समझा जा सकता है। वे कैमरे को कोई तवज्जो ही नहीं देना चाहते। एक नजर से देखें तो उनका अभिनय पूरी बांग्ला फिल्मों के बीच धीरे-धीरे किसी उद्धरण (quotation) की तरह बन जाता है। मानो कोई स्वगत-कथन हो; मानो वे किसी बिल्कुल निजी और गैर-मौजूद कुछेक दर्शकों के लिए अभिनय कर रहे हों— शायद खुद को देखने के लिए, जिसके चलते उनके होंठ हिलने या मुड़कर देखने की अदा भी कोरियोग्राफी (choreography) का रूप ले लेती है।

यह सोचकर हैरानी होती है कि सत्तर और अस्सी के दशकों में जब वे निर्मल दे (डे), अजय कर या अग्रदूत और अग्रगामी के साथ फिल्में नहीं करते थे, और उनके हिस्से सिर्फ कमजोर निर्देशकों के अनुरोध ही आते थे, तब भी वे अपने किरदारों में कितनी गजब की बेबाकी से जान फूँक देते थे। हमारे सामने 'बाघबंदी खेला' जैसी मामूली फिल्म मौजूद है, जहाँ यह कह देना ही काफी नहीं है कि पटकथा उनके लिए लिखी गई थी, बल्कि उत्तम कुमार पूरी कहानी पर छाए हुए हैं और हर तरफ व्याप्त हैं। उनकी शारीरिक भाषा, उनके संवाद, उनके बोलने का ढंग— सब पर उनका 'हस्ताक्षर' है। हमारा मन 'फ्रेंच रेनोआ' (French Renoir) निबंध से आंद्रे बाजिन (André Bazin) का एक वाक्य चुराने को मचल उठता है: "This style is added to the script like rich paint liberally applied to a line drawing: often the colour obscures and spills over the lines." शायद पटकथा, कहानी और किरदार जिस तरह उत्तम कुमार के इर्द-गिर्द घूम रहे थे, उनकी जय-जयकार कर रहे थे, यहाँ तक कि पतंगा जैसे आग की तरफ खींचा चला आता है— वैसे ही जर्जर और कच्चे-पक्के आख्यान उनके साथ खुशी-खुशी जान देने को तैयार थे, उसमें अभिनय-आधारित ऑटोरिज़्म (Auteurism) की चर्चा कहाँ तक मुमकिन है, इस पर हम बहस कर सकते हैं। लेकिन फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि पटकथा के दायरे से बाहर छलक पड़ने की यह प्रवृत्ति— यही उनका स्वभाव उन्हें आने वाले समय का सबसे बड़ा प्रवक्ता साबित करता रहेगा।

मिट्टी के जीव और नश्वर
"देवताओं सी दुर्लभ शख्सियत नहीं, बल्कि आम आदमी के सुख-दुख को समेटे हुए वे हमारी ही मिट्टी के जीव और नश्वर नायक बने।"
लेकिन बंगाली बुद्धिजीवियों ने आज तक उत्तम कुमार को लेकर कभी कोई खास बौद्धिक चिंता नहीं की है। इसका एक बड़ा कारण यह नहीं है कि फिल्म को कला के रूप में कमतर या गैर-संभ्रांत माना जाता है, बल्कि यह है कि वे लोकप्रियता के सौंदर्यशास्त्र को लेकर मन ही मन एक गहरे संशय और अविश्वास से भरे रहते हैं। उत्तम कुमार सर्वप्रिय हैं, उत्तम कुमार एक घटना हैं, लेकिन सत्यजित राय ने भी (एंड्रू रॉबिंसन के विवरण से यह साफ है) बुद्धिजीवियों के बीच, खासकर युवा लड़कियों के बीच— कम से कम प्रेसिडेंसी कॉलेज की छात्राओं के बीच सौमित्र चटर्जी की स्वीकार्यता को लेकर जिस तरह का पक्षपातपूर्ण बयान दिया है, वह यहाँ के संभ्रांत बुद्धिजीवियों की संकीर्ण मानसिकता को ही बेनकाब करता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कला के संभ्रांत होने के लिए जिस नफासत की जरूरत होती है, उत्तम को उसके मौके बहुत कम मिले हैं। उनका पूरा जीवन-नाट्य लोगों के मनोरंजन को ही समर्पित रहा है। भारी से भारी मुसीबतों में भी उन्हें अपनी मेहनत से सफलता का ताज हासिल करना पड़ा था।
Marilyn played the best game with the worst hand of anybody I know. हॉलीवुड में मर्लिन मुनरो के बारे में कही जाने वाली यह बात टॉलीगंज के उत्तम कुमार पर भी कई स्तरों पर लागू होती है। अनिल या सौमित्र जैसे सहकर्मियों की तुलना में उनका चेहरा भी उतना आकर्षक नहीं था। उनके पास लहराते, कोमल यौवन से भरे अंगों की लावण्य-छटा नहीं थी; उनकी हल्की मुस्कान से हवा मदहोश नहीं हो जाती थी। फिल्म ‘नायक’ में इस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन वे कभी कैलेंडर पर छपे कृष्ण नहीं रहे। रूप के लिहाज से उत्तम देवताओं जैसे दुर्लभ नहीं थे। उनके भीतर लंबे साल-वृक्ष जैसे कंधों और विशाल भुजाओं वाला शारीरिक सौष्ठव भी नहीं था। फिर भी सितारा वही थे, नायक वही। यहाँ तक कि उच्चवर्गीय संस्कृति की आलोचनात्मक दृष्टि भी इसी अभिनेता को मैटिनी आइडल का दर्जा देती है। सत्यजित राय की ‘नायक’ उत्तम कुमार पर एक सामाजिक टिप्पणी की तरह बनी रहेगी।

फ्रांसीसी विचारक रोलां बार्थ ने ग्रेटा गार्बो और ऑड्रे हेपबर्न के चेहरों की तुलना करते हुए कहा था: गार्बो का चेहरा यदि विचार है, तो हेपबर्न का चेहरा घटना। इसी सूत्र को आगे बढ़ाते हुए मैं कहूँगा कि पूर्ववर्तियों में प्रमथेश बरुआ का चेहरा घटना है, जबकि उत्तम कुमार का चेहरा विचार का विस्तार। कामदेव को लज्जित करते रूप वाले प्रिंस बरुआ यदि देवता हैं, तो उनके ठीक बाद भारी होंठों और चपटी
नाक वाले उत्तम कुमार मिट्टी के साधारण और नश्वर जीव हैं। बरुआ राजकुमार जैसे दूर, गरिमामय और श्रद्धा जगाने वाले लगते हैं। उन्हें देखकर हम मुग्ध होते हैं, मगर वैसी खूबसूरती तो आसमान के चाँद पर ही फबती है । दुर्गादास बंद्योपाध्याय और प्रमथेश बरुआ कभी हमारे रोजमर्रा के जीवन में उतरकर नहीं आए। वे साधारण जीवन का अभिनय करते हुए भी पर लगते किसी दूसरी दुनिया के जीव थे। उनके प्रति कौतूहल था, आत्मीयता नहीं। दूसरी ओर, पचास और साठ के दशकों में सितारा होने के बावजूद उत्तम कुमार हमारे पड़ोसी जैसे थे; लगता था, उनसे हालचाल पूछा जा सकता है। हमारी मुग्धता के बीच वे बंगाली सिनेमा के पहले रक्त-मांस के मनुष्य बने। उनकी मौजूदगी में पहली बार मिट्टी के घर में चाँद उगा। पचास के दशक की शुरुआत में उत्तम ने बंगालियों का दिल इसलिए जीता कि उनका गैर-अभिजात चेहरा इतिहास के फलक पर ऐसा पुल बना, जो assures the passage from awe to charme ( जो विस्मय से अपनत्व तक ले जाता था)। स्वतंत्रता के बाद के दौर में वे कई तरह से हमारे जीवन में आश्वासन और ताज़ी हवा लेकर आए। हेमंत मुखोपाध्याय की आवाज़, सुचित्रा सेन की आहत भौंहों की अदा और अजय कर के सॉफ्ट-फोकस प्रकाश के बीच उत्तम कुमार ने जो सांस्कृतिक संसार रचा, उस पर आज तक कोई गंभीर चर्चा शुरू नहीं हुई।

जिस सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना से सितारे बनते हैं, उसके संदर्भ में बंगाली सिनेमा के उत्तम कुमार और हॉलीवुड की मर्लिन मुनरो में कुछ समानताएँ हैं। पचास के दशक में जब मर्लिन समुद्र से उठी वीनस की तरह अमेरिकी तट पर आ पहुँचीं, तब युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन उसका असर बाकी था। मैकार्थी का आतंक और शीतयुद्ध सामाजिक जीवन की उथल-पुथल को थमने नहीं दे रहे थे; फ्रायड के विचार धीरे-धीरे रोजमर्रा के जीवन में दाखिल हो रहे थे। नैतिकता और यौनता को लेकर नए सवाल उठ रहे थे। किन्से रिपोर्ट के दौर में वैचारिक आधार से वंचित व्यक्ति के भीतर पैदा होने वाली आत्म-क्षति का तीखा रूप मर्लिन की यौन-विद्युत-सी उपस्थिति में दिखता है—उनका अचानक उभरना, शरीर का बेधड़क और निर्मम प्रदर्शन, और पूर्वी विषाद से भरा अंत। अमेरिकी लोकतंत्र की राजनीतिक रूपरेखा जितनी अपारदर्शी होती गई और संस्थाओं की सर्वशक्तिमत्ता जितनी अमूर्त हुई, लोकतांत्रिक मनोरंजन के माध्यमों में असहायता उतनी ही फैलती गई। वॉल्ट व्हिटमैन के अमेरिका की जगह वॉल स्ट्रीट के अमेरिका में नैतिक आधार की जो दरिद्रता थी, वह पचास के दशक में मर्लिन के जरिए वैचारिक तनाव के रूप में सामने आई। उनकी निजी कामनाओं का विस्फोट अंततः अमेरिकी समाज-व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करता है। प्रदर्शनप्रियता का भी सामाजिक आधार होता है। उत्तम कुमार अपेक्षाकृत स्थिर सभ्यता के व्यक्ति थे। लेकिन विभाजन और स्वतंत्रता के बाद के पश्चिम बंगाल में, मेरे विचार से, सामाजिक दमन ने ऐसे सपनों के संसार की जमीन तैयार की जो देश-काल की सीमाओं से परे था। उस सपने में एक सितारा उभरा—उत्तम कुमार जैसा—जो अभिनय, केश-सज्जा और बोलने के ढंग में, अफवाहों और गपशप में, एक साथ बहुत पास भी था और बहुत दूर भी।

हमारे यहाँ आधुनिकता, शहरीकरण और सिनेमा की कहानी कुछ अलग है। इसमें केवल रेमंड विलियम्स नहीं, जीवनानंद की गाँव और शहर वाली कथा भी शामिल है। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘अपराजित’ में अपूर्व अपरिचित शहर कोलकाता में कदम रखते ही सिनेमा के बारे में सोचता है। बंगाल के धीमे ग्रामीण समाज में कला की दृष्टि से देखें तो छापेखाने की तुलना में सिनेमा आधुनिकता का कहीं अधिक सक्रिय तकनीकी हस्तक्षेप था। अपूर्व कुमार राय—बीसवीं सदी की आधुनिकता के शुरुआती दौर का हमारा नायक—यह जानता था। इसीलिए वह अपने आश्रयदाता अखिल बाबू से पहला अवसर मिलते ही पूछता है, ‘जहाँ बायोस्कोप दिखाया जाता है, वह यहाँ से कितनी दूर है?’ ‘पुतुल नाचेर इतिकथा’ का शशि जब गाओदिया जैसे छोटे-से गाँव में पहुँचता है, तो हमारी नागरिकता को एक नया आयाम मिलता है।
यह भी सच है कि लोकप्रिय कथाओं के युवक शहर की गलियों में भावुक ग्रामीण गीत गाते फिरते थे। विष्णु दे (डे) की कविता में तीस के दशक की आर्थिक उथल-पुथल से ‘बेरोजगार पक्षी’ सामने आता है। उनकी ‘जन्माष्टमी’ का चतुर युवक पूछता है, ‘यह जो अलका तुम्हारे पास है, उसके साथ कौन नीरस रह सकता है?’ और चालीस के दशक की शुरुआत में ईर्ष्या से सोचता है, ‘क्या वह लिली का टेनिस जोड़ीदार खसरू बेग है?’ यही युवक अगर हल्की-फुल्की लोकप्रिय कथा में आगे चलकर ‘बिचारक’ या ‘सप्तपदी’ का कृष्णेंदु बनकर सामने आए, तो इसमें आश्चर्य क्या है? ‘कल्लोल’ युग से बंगाली साहित्य में मेस-बाड़ी का जो दबदबा रहा और समर सेन समेत चालीस के दशक की कविता में जो रोमानी आह सुनाई देती है, उसका असर लोकप्रिय संस्कृति पर भी पड़ा। उत्तम कुमार का सिनेमा इसी परंपरा का उत्तराधिकारी है। ‘कल्लोल’ युग के मध्यवर्गीय युवक में विद्रोह से अधिक आक्रोश था। समय की चाल को थोड़ा-सा कोण बदलकर देखें, तो ‘प्राणहीन इस नगर की कथा’ में उत्तम कुमार सपनों की अनेक दुस्साहसी आकांक्षाओं के बीच से गुजरते दिखाई देते हैं।
लोकप्रियता की कथा ने दमयंती-शकुंतला और नल-दमयंती के परिचित आख्यानों को कभी नहीं भुलाया। परिवार की सामूहिकता से व्यक्ति की स्वतंत्र मुक्ति तक, परंपरा से मान्यता प्राप्त विस्मरण और गंधर्व-विवाह बार-बार यादगार कड़ी का काम करते रहे। शहर में जड़ें जितनी गहरी होती गईं, उत्तम कुमार भी कार, शराब, टेलीफोन और स्त्रियों की दुनिया में उतने ही सहज दिखाई देने लगे। इसकी मिसाल हैं ‘शंखबेला’, ‘छद्मवेशी’, ‘चिरदिनेर’ और ‘बिकेले भोरेर फूल’।

किसी को निराश नहीं करते
"दौर चाहे निराशा और अनिश्चितताओं का रहा हो, पर बंगाली जनमानस के सपनों को सँवारने वाले यह नायक कभी किसी को निराश नहीं करते ।"
आखिर उत्तम कुमार इतने बड़े स्टार क्यों बन गए? यह तो साफ है कि जिस अंतर्द्वंद्व का समाधान समाज और इतिहास के स्तर पर होना मुमकिन नहीं था, उसका समाधान फिल्मी पर्दे की जिंदगी में हो रहा था। रिचर्ड डायर (Richard Dyer) ने अपने स्टार-सिद्धांत में यह दिखाया था कि किसी कलाकार की लोकप्रियता काफी हद तक इस बात पर टिकी होती है और विकसित होती है कि वह आम लोगों की उम्मीदों और सामाजिक मूल्यों को कितना ठोस और प्रामाणिक रूप दे पाता है। एक 'सितारे' के प्रति हमारा जो बेकाबू खिंचाव होता है, या यों कहें कि जो जादू एक स्टार पैदा करता है जिसे अंग्रेजी में 'करिश्मा' (charisma) कहा जाता है, उसकी असलियत को सबसे पहले राजनीति के अध्ययन में जाने-माने समाजशास्त्री मैक्स वेबर (Max Weber) ने परखा था। बाद में जब इसी विश्लेषण को समाज की दूसरी व्यवस्थाओं और संस्थाओं पर भी आजमाया गया, तो हमने जाना: Charismatic appeal is effective especially when the social order is uncertain, unstable and ambiguous and when the charismatic figure or group offers a value, order or stability to counterpoise this. (करिश्माई अपील खासतौर से तब असरदार होती है जब समाज की व्यवस्था अनिश्चित, डगमगाती और उलझन भरी होती है और जब वह करिश्माई शख्सियत या समूह उस गड़बड़झाले का मुकाबला करने के लिए कोई मूल्य, व्यवस्था या ठहराव पेश करता है।)

अब अगर हम आजाद और बँटे हुए बंगाल की तरफ नजर डालें, तो उत्तम कुमार के जन्म की असल जमीन हमें साफ-साफ दिखाई देने लगेगी। तैंतालीस का अकाल और देश का बँटवारा हमें डरावनी और दुःस्वप्नों से भरी रातों में ले गए। । वह रात इतनी नाउम्मीदी से भरी थी कि हमारे लिए आजादी की नई सुबह भी उदास और फीकी थी। आजादी का वह अधूरापन, मार्क्सवाद की ओर बढ़ते प्रस्ताव, हाल ही में खत्म हुए दंगे और कुछ समय के लिए रुका हुआ तेलंगाना विद्रोह— इन सबने मिलकर हमें विकास की पंचवर्षीय योजनाओं और मिश्रित अर्थव्यवस्था की पहल का खुले दिल से स्वागत करने नहीं दिया। नए गणतंत्र का जन्म हमारे अग्रजो को एक बेमतलब का सांत्वना पुरस्कार जैसा लगा। ठीक इसी पृष्ठभूमि में उत्तम कुमार के आने की कहानी लिखी गई थी। स्वतंत्र भारत के पहले लोकतांत्रिक चुनाव के साल ,1952 में उनकी पहली अहम फिल्म 'बसु परिवार' रिलीज हुई। और उसके बाद से ही उनकी बेमिसाल जीत का सिलसिला शुरू हो गया। एक सामंती समाज में पैर पसारते पूँजीवाद और औद्योगीकरण के दौर में जब गाँव-गिराव के पुराने ताने-बाने को मिटाकर इंसान अपनी अलग पहचान बना रहा था, तब जनमानस उस व्यक्ति को इतिहास से बाहर एक अलग ऊंचाई पर देखना चाहता था। खुदीराम या सुभाष चंद्र बोस जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व के लिए उस उम्मीद को पूरा करना मुमकिन नहीं था; ऐसे में किसी बड़े सितारे या नक्षत्र की जरूरत आन पड़ी थी। पचास के दशक में शहर और गाँवों से आए अनगिनत युवक-युवतियों के लिए वही सितारे उत्तम कुमार थे।

उत्तम कुमार किसी को निराश नहीं करते थे, क्योंकि उनके पास वह संस्थागत शक्ति नहीं थी जो किसी राजनेता या प्रशासक के पास होती है। इसी कारण उनका करिश्मा अक्षुण्ण रहता था। सामंती समाज में जो गुप्त आकांक्षाएँ और वैवाहिक अपूर्णताएँ दबकर रह जाती थीं, वे उत्तम-सुचित्रा के मेलोड्रामा में किसी दूसरे संसार में पूरी होती दिखाई देती थीं। उत्तम कुमार की उपस्थिति में एक विनम्र, अनुरक्त, फिर भी उदासीन ‘मुश्किल आसान’ का आश्वस्तिदायक भाव था— जो किसी भी बड़े स्टार की पहचान है। फिल्म 'हारानो सुर' के आखिर में जब उनकी याददाश्त लौट आती है और वे नायिका को 'डॉक्टर बाबू' कहकर पुकारते हैं, तो नायिका उनके बेकाबू होने से ठीक पहले ही यह ताड़ जाती है कि यह शख्स दुनिया के तमाम डॉक्टरों से बहुत बड़ा है। उस सीने से लगकर सारे संकट जैसे समाप्त हो जाते हैं। । उत्तम कुमार इस पुरुष-प्रधान समाज में परिवार के पूरे ढाँचे को बिना हिलाए-डुलाए समस्याओं का बेहतरीन हल ढूँढ लेते हैं। यह समाधान परिवार, समाज या किसी भी संस्था की हुकूमत पर कोई सवाल नहीं उठाता। न तो पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था खतरे में पड़ती है और न ही हुकूमत, बस लोगों की दबी हुई इच्छाएँ फिल्मी परदे पर सच साबित हो जाती हैं। और उससे भी ज्यादा मजबूती से जो चीज अपनी जगह बनाती है, वह है इस पुरानी व्यवस्था (status quo) का सच। हरबर्ट मार्क्युस (Herbert Marcuse) ने स्टार सिस्टम को समाज की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने वाला कोई बहुत अच्छा कदम माना हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। पचास और साठ के दशकों की उथल-पुथल और आंदोलनों को देखकर यही लगता है कि उत्तम कुमार की फिल्मों ने कई मायनों में मुख्यधारा की विचारधारा को मजबूत करने का ही काम किया था।

उत्तर-औपनिवेशिक मध्यवर्गीय परिवेश आकार ले रहा था; लोकतांत्रिक संस्थाएँ मध्यवर्गीय समाज की स्वीकृति चाहती थीं; और नए गणराज्य के संरक्षक ईमानदारी तथा कठिन परिश्रम की ऐसी किंवदंती चाहते थे, जिस पर व्यक्ति का भरोसा टिक सके। उत्तम की कहानियाँ तीन दशकों तक सुनाई जाती रहीं, तो इन सबके लिए उनमें एक संतोषजनक उत्तर मिलता था। वे बंगाली सिनेमा के पहले अभिनेता थे जो सचमुच स्टार के स्तर तक पहुँचे। मुख्यतः प्रिंट मीडिया ने उनकी छवि गढ़ी, लेकिन मान्यता-प्राप्त मीडिया के बाहर प्रशंसकों की बातों, तरह-तरह की गैर-जिम्मेदार जीवनियों और तस्वीरों में भी उनका सितारा-पाठ फैलता रहा। वे स्वप्न के नायक थे, मगर उस स्वप्न के विराम-चिह्न वास्तविकता से उठाकर रखते थे। वे ऐसा कुछ नहीं करते या घटित नहीं करते थे जो बंगालियों को बिल्कुल अनजाना लगे। उनका आकर्षण कठोर पुरुष-सौष्ठव में नहीं, बल्कि एक कोमल लावण्य में था। पचास और साठ के दशकों में वे युवकों का सपना और युवतियों की कामना बने रहे। उनकी नायिकाओं के वक्ष-विभाजन या उभार की तुलना में संकोच से काँपते होंठ उन्हें अधिक विचलित करते थे। वे खुद भी देह की तीव्रता से दर्शकों को नहीं जीतते थे; बंगाली दर्शक उन्हें उनकी तिरछी निगाह से ज्यादा पहचानता था।
किसी सितारे के लिए जिस प्रामाणिकता की जरूरत होती है, उत्तम कुमार ने अपने देश-काल को समझते हुए उसे बनाए रखा। उनके कपड़ों, पश्चिम बंगाल की उच्चारण-शैली, अभिमान, अभिजात्य, गरीबी और संवाद—हर चीज में प्रामाणिकता रचने की कला मौजूद थी। वे जीवन भर जानते रहे कि अलंकार जब तक अलंकार के रूप में पहचाना न जाए, तब तक वह विश्वसनीय और सहज अभिव्यक्ति बना रहता है। वे सबसे पहले और अंततः दर्शकों के अभिनेता थे। उनके अभिनय की सफलता और उसकी सीमा, दोनों यहीं हैं। उन्होंने शराबी की भूमिका निभाई, लेकिन यह जानते हुए कि उनके दर्शक नशे की सीमा पहचानते हैं। कहीं-कहीं वे स्थूल जरूर होते हैं, पर अश्लील नहीं—क्योंकि मध्यवर्गीय रुचि की सीमा उन्हें मालूम थी। जैसे पयार बंगाली कविता का मूल छंद है, वैसे ही उत्तम का संकोची या अभिमानी चेहरा मध्यवर्गीय बंगाली की आत्म-पहचान है। इसलिए दर्शक जब उन्हें प्रेमी के बजाय शैतान के रूप में भी देखता है, तब विचलित नहीं होता; उत्तम की हल्की-सी मुस्कान ही उनका प्रायश्चित्त बन जाती है। उनकी यह निर्मलता बार-बार कहती है—‘मैं जहन्नुम की आग में बैठकर फूलों-सी हँसी हँसता हूँ।’ उन्नीसवीं सदी का प्रबुद्ध बंगाली, बीसवीं सदी के पतन-बिंदु पर खड़ा होकर अब और किस आत्मगौरव का दावा कर सकता है?

सत्यजित राय ने उत्तम कुमार को मैटिनी आइडल के रूप में अपनी फिल्म के लिए चुना था, वह एकदम सटीक और अचूक फैसला था। सच कहें तो 'नायक' के अरिंदम के रोल में उत्तम कुमार के अलावा किसी और की कल्पना तक नहीं की जा सकती। एक बंगाली अपने चहेते सितारे से जिन-जिन चीजों की उम्मीद करता था, उत्तम उन सबको पूरा कर देते थे। नायक का वह 'नायक' वाला अभिनय बंगाली समाज का सबसे सच और जीवंत रूप है। सत्यजित राय खुद एक बहुत बड़े कलाकार थे, इसलिए वे अच्छी तरह जानते थे कि उत्तम कुमार जब कैमरे के सामने कलाकार नहीं भी होते हैं, तब भी वे नायक ही रहते हैं और क्षितिज से थोड़े दूर, एकदम अलहदा नजर आते हैं— मानो कोई देवदास हों। हमारी चेतना में वे प्रायश्चित्त के दूसरे छोर की तरह है। शराब, औरतें और दुनिया भर के पाप— देवदास या उत्तम कुमार के कदमों को कभी डिगा नहीं पाते। उपन्यास और सिनेमा के दायरे से बाहर निकलकर वे हमारी किसी जीवित परीकथा जैसे बन जाते हैं।

आज सावन की इस झमाझम बारिश में भी, पानी की इन असीम धाराओं के बीच आँसू भरी आँखों से भी आप उन्हें वापस नहीं पा सकेंगे। फिर भी बैशाख और वसंत के दिनों में, हमारे टेलीविजन की दुनिया में कटने वाले इन खाली पहरों में, हमारे रक्त-किंशुक बनकर वे आज भी पूरी तरह जाग रहे हैं।
प्रो. संजय मुखोपाध्याय (Sanjoy Mukhopadhyay) भारत के प्रख्यात फिल्म विद्वान, निबंधकार और सांस्कृतिक आलोचक हैं। वह जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के फिल्म अध्ययन विभाग (Department of Film Studies) के संस्थापक अध्यक्ष तथा 'स्कूल ऑफ मीडिया, कम्युनिकेशन एंड कल्चरल स्टडीज' के पूर्व निदेशक रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार के फिल्म निर्माण संस्थान 'रूपकला केंद्र' के निदेशक और सीईओ (CEO) के रूप में भी सेवाएं दी हैं। सिनेमाई इतिहास, बांग्ला संस्कृति और सत्यजीत राय एवं ऋत्विक घटक के सिनेमा पर उनके आलोचनात्मक लेखन को अकादमिक जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
आलेख साभार बांग्ला गणशक्ति शारदीय (संख्या 2026)। हिन्दी अनुवाद : केशव कुमार भट्टड़ (मूल लेखक से स्वीकृत) । चित्र साभार इंटरनेट।
स्पष्टीकरण: चित्र 'मर्लिन मुनरो और उत्तमकुमार' काल्पनिक (आलेख के संदर्भ में सहायता हेतु AI से निर्मित)
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