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आर्टिकल 15 (2019)- राजा, प्रजा और संविधान: जब व्यवस्था का 'संतुलन' ही सबसे बड़ी हिंसा बन जाए - केशव भट्टड़

केशव कुमार भट्टड़•24 जून 202613 मिनट पठन204 बार पढ़ा गया

फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।

इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।

“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है..  राजा होता है..  प्रजा होती है..  सेवक होता है..  दास होता है।  इस सबका  संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर...  सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।

आर्टिकल 15 (2019)- राजा, प्रजा और संविधान: जब व्यवस्था का 'संतुलन' ही सबसे बड़ी हिंसा बन जाए - केशव भट्टड़

हिन्दी फिल्म : 'आर्टिकल 15' (2019)

-केशव भट्टड़

राजा, प्रजा और संविधान: जब व्यवस्था का 'संतुलन' ही सबसे बड़ी हिंसा बन जाए


                आर्टिकल 15 अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक फिल्म है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित है, जो धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। फिल्म उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाके में दलित लड़कियों के साथ हुए यौनिक हिंसा और हत्या के मामले की जांच करती है, जिसमें ऊँची जातियों की दमनकारी व्यवस्था, पुलिस-प्रशासन (राज्य) की मिलीभगत और पूंजीवादी-सामंती शक्तियों की भूमिका को , शोषण को उजागर किया गया है।

 

                यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त जातिवादी उत्पीड़न की संरचनात्मक जड़ों को छूती है। यह दर्शाती है कि जाति व्यवस्था पूंजीवाद के साथ मिलकर दलितों और पिछड़ों के श्रम का शोषण करती है, खासकर महिलाओं पर दोहरी हिंसा (जाति और लिंग) के रूप में। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे ऊँची  जाति के लोग कानून को अपने हाथ में लेते हैं, पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं होती, और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को दबाव डालकर बदलवाया जाता है। यह राज्य के वर्गीय-जातीय चरित्र को उजागर करता है, जहाँ निचली जातियों के लिए न्याय व्यवस्था दुश्मन बन जाती है। 

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प्लॉट का सारांश :

                फिल्म की कहानी लालगांव (उत्तर प्रदेश) नामक काल्पनिक गांव में शुरू होती है। दो अवयस्क दलित लड़कियां (चचेरी बहनें) स्कूल बस में फंसाई जाती हैं, उनका बलात्कार किया जाता है और बाद में उन्हें पेड़ पर सरे-आम लटका दिया जाता है। तीसरी लड़की 'पूजा' लापता रहती है। तीन रुपये दैनिक मजूरी बढ़ाए जाने की मांग और उसके पूरी नहीं होने पर काम छोड़ देने के साहस पर निचली जाति को उसकी औकात दिखाने और सबक सिखाने के लिए ठेकेदार (पूंजीपति) और ऊँची जाति के पुलिस अधिकारी (प्रसाशन) की मिलीभगत से इस घटना को अंजाम दिया जाता हैं। बलात्कार और हत्या में ठेकेदार, स्थानीय थाने का पुलिस अधिकारी और उनके मोहरे शामिल रहते है। ठेकेदार पर स्थानीय जन प्रतिनिधि का वरद हस्त है। लड़कियों के पिता कहते है : 8-10 दिन रखकर छोड़ देते, कम से कम जीवित तो रहती। लड़कियों को समलैंगिक प्रसारित कर हत्या का आरोप - 'ऑनर किलिंग' - लड़कियों के पिताओं पर लगा दिया जाता है - और दबाव डालकर उसे स्वीकार भी करा लिया जाता है।

                नायक अयन रंजन (आयुष्मान खुराना), दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से शिक्षित और आधुनिक सोच वाला आईपीएस अधिकारी, अपनी पहली पोस्टिंग पर यहां आता है। वह शुरू में जाति व्यवस्था की गहराई को नहीं समझ पाता। स्थानीय पुलिस अधिकारी ब्रह्मदत्त सिंह (मनोज पाहवा) और किशन जाटव (कुमुद मिश्रा) जैसे सवर्ण-प्रभावित अधिकारी मामले को दबाने की कोशिश करते हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बलात्कार के सबूत छिपाए जाते हैं और घटना को 'पारिवारिक विवाद' बताया जाता है।

                 अयन जांच आगे बढ़ाता है। वह ऊपरी जातियों के सामंती ताकतवरों (जैसे ब्रह्मदत्त सिंह और स्थानीय राजनीतिक नेता) की मिलीभगत, पुलिस की भ्रष्टाचारपूर्ण भूमिका और दलित समुदाय के शोषण को उजागर करता है। फिल्म में दलित कार्यकर्ता निशाद (मोहम्मद जीशान अय्यूब) का किरदार महत्वपूर्ण है, जो भीम संघर्ष सेना का नेता है और व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करता है। जांच के दौरान अयन को पता चलता है कि अपराध केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरी जातीय-वर्गीय संरचना का हिस्सा है। पुलिस अधिकारी अयन से कहता है कि केस क्लोज कर दीजिए, नहीं तो यहाँ का सामाजिक संतुलन गड़बड़ा जाएगा। यहाँ सब ऐसे ही चलता है। फिल्म में दलित ब्राह्मण एकता के राजनीतिक ढोंग पर भी करारा कटाक्ष है। सीबीआई का राजनीतिक उपयोग, सत्ता के हित में संतुलन साधने के लिए सीबीआई अधिकारी की पैंतरेबाज़ी और इस सबके पीछे सत्ता की अदृश्य उपस्थिति सत्ता के वास्तविक चरित्र पर गहराई से सोचने को मजबूर कर देती है।

                क्लाइमेक्स में न्याय की लड़ाई तीव्र होती है, जहां एएसपी अयन व्यवस्था के हस्तक्षेप और रोकने के 'लगभग सफल दबाव' के बावजूद तीसरी लड़की 'पूजा' को ढूंढने में सफल होता है और गवाही और प्रमाणों के साथ सच्चाई सामने लाता है।

स्क्रिप्ट की बात :

                स्क्रिप्ट (अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी द्वारा) वास्तविकता पर आधारित, संवाद-प्रधान और जांच-केंद्रित है। यह अपराध थ्रिलर के रूप में शुरू होकर गहरी सामाजिक आलोचना में बदल जाती है। स्क्रिप्ट की मजबूती उसके यथार्थवादी चित्रण में है — ग्रामीण भारत की जातिगत हिंसा, पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) न दर्ज होने की स्थिति, और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हेराफेरी को बिना अतिरंजना के दिखाया गया है।

               स्क्रिप्ट सराहनीय है क्योंकि यह संरचनात्मक हिंसा को उजागर करती है। यह दिखाती है कि जातिवाद केवल व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है, जो श्रम शोषण और महिलाओं पर दोहरे दमन को बनाए रखता है। संवादों के माध्यम से ब्राह्मणवादी विचारधारा और सवर्ण प्रभुत्व की आलोचना की गई है।

                 फिल्म की ताकत उसके साहसिक प्रयास में है — मुख्यधारा के बॉलीवुड में जाति के मुद्दे को इतनी स्पष्टता से उठाना। यह 2014 के बदायूं कांड और अन्य वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, जो दलित महिलाओं पर अत्याचारों की निरंतरता को रेखांकित करता है। इसे सराहा जा सकता है क्योंकि यह सवर्ण प्रभुत्व और ब्राह्मणवादी विचारधारा की आलोचना करता है, साथ ही दिखाता है कि कैसे शिक्षा प्राप्त शहरी सवर्ण अधिकारी (आयुष्मान खुराना का किरदार) भी शुरू में व्यवस्था की गहराई समझ नहीं पाता। फिल्म पूंजीवाद और सामंती अवशेषों के गठजोड़ को उजागर करती है, जहां राज्य व्यवस्था संतुलन के नाम पर निचली जातियों के शोषण को बनाए रखने का साधन बन जाता है।

                 हालांकि फिल्म सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स (Savarna Saviour Complex) में फंस जाती है, जहां एक ऊँची जाति का नायक दलितों की मुक्ति का प्रतीक बन जाता है, जबकि दलित पात्र (निशाद सहित) सहायक भूमिका में रह जाते हैं। दलित पात्रों को अपेक्षाकृत कम एजेंसी दी गई है; वे मुख्यतः पीड़ित के रूप में दिखाए गए हैं, जबकि बदलाव का श्रेय सवर्ण नायक को जाता है। यह अपर्याप्त है, क्योंकि वास्तविक मुक्ति संघर्ष दलित-बहुजन आंदोलनों (जैसे अंबेडकरवादी, मार्क्सवादी) से ही आता है, न कि व्यक्तिगत सुधारवादी नायक से। फिल्म जाति को मुख्यतः ग्रामीण समस्या के रूप में चित्रित करती है, जबकि वास्तविकता में यह शहरी मध्यवर्ग और संस्थाओं में भी गहराई से व्याप्त है।

फिल्म के गूढ़ार्थ संवाद

स्क्रिप्ट के संवाद अत्यंत प्रभावशाली और विचारोत्तेजक हैं, जो जातिवादी व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करते हैं:

  • निशाद का संवाद व्यवस्था की निष्पक्षता पर: “आग लगी हो तो न्यूट्रल रहने का मतलब ये होता है सर कि आप उनके साथ खड़े हो जो आग लगा रहे हैं।”  (यह तटस्थता की आड़ में सवर्णों की मिलीभगत को उजागर करता है।)

  • संरचनात्मक हिंसा पर: “कभी-कभी बाहर दिखने वाले वॉयलेन्स के पीछे ऐसा वॉयलेन्स होता है जिसके बारे में कोई बात नहीं करता। वो हमारी सभ्यता का एक हिस्सा बन जाता है जिसे हम हिंसा नहीं कहते, सामाजिक व्यवस्था कहते हैं।” (व्यवस्था में दैनिक शोषण को 'सामान्य' बना दिया जाता है।)

  • निशाद का एक और गहरा संवाद: “इंसाफ की भीख मत मांगो... बहुत मांग चुके।” (यह दलित आंदोलनों की निराशा और खुद की सांगठानिक ताकत पर जोर देता है।)

  • अयन का एक प्रभावशाली संवाद : “Life में हां या ना की probability (संभावना) 50-50 की होती है... और मुझे लगता है कि 'हाँ' वाला 50 बहुत होता है।”

  • निशाद ; “हम आखिरी थोड़े ना हैं...” (दलित पात्रों की पीढ़ी दर पीढ़ी प्रतिरोध की भावना)।

                इन संवादों के साथ फिल्म मनोरंजन से ऊपर उठाकर एक राजनीतिक हस्तक्षेप बन जाती हैं। फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है:

अधीनस्थ कर्मचारी: “माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है..  राजा होता है..  प्रजा होती है..  सेवक होता है..  दास होता है।  इस सबका  संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर...  सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “

-      नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?”

इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं –

                1. धर्म और दिव्यता का सहारा (Divine Sanction)

                            "ब्रह्मा जी ने बनाया है, संस्कृत में।"

                भारतीय मानसिकता में किसी भी गैर-बराबरी या शोषणकारी व्यवस्था को टिकाए रखने के लिए सबसे बड़ा हथियार 'धर्म' और 'परंपरा' को बनाया गया। जब आप किसी व्यवस्था को 'ईश्वरीय विधान' (Divine Law) घोषित कर देते हैं, तो आम इंसान उसके खिलाफ विद्रोह करने से डरता है। उसे लगता है कि व्यवस्था का विरोध करना ईश्वर का विरोध करना है। 'संस्कृत में' कहना इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान और भाषा को कैसे एक खास वर्ग के एकाधिकार और प्रामाणिकता (Authority) का टूल बनाया गया।

                2. संतुलन का भ्रम (The Myth of Balance)

                            "इस सबका संतुलन है सर एक... हमको कोई अधिकार नहीं है इस संतुलन को बिगाड़ने का।"

                यहाँ 'संतुलन' का अर्थ न्याय या समानता नहीं है। यहाँ संतुलन का अर्थ है—"जो जहाँ है, वहीं रहे।" शोषित अपनी जगह रहे और शोषक अपनी जगह। इस मानसिकता के अनुसार, अगर कोई दलित, वंचित या सेवक अपने हक के लिए आवाज़ उठाता है, तो वह समाज का सुधार नहीं कर रहा, बल्कि 'संतुलन बिगाड़ रहा है'। यह पीड़ित को ही दोषी (Victim Blaming) ठहराने की कला है।

                3. गुलामी की आदत (Psychology of Dependency)

                            "सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ?"

                यह इस संवाद का सबसे डरावना और दुखद हिस्सा है। सदियों की गुलामी और ऊंच-नीच ने इंसानी दिमाग को इस कदर पंगु बना दिया है कि वह बिना किसी 'मालिक' या 'राजा' के अपनी सत्ता की कल्पना ही नहीं कर पाता। उसे लगता है कि समाज को चलने के लिए किसी न किसी का 'दास' होना ज़रूरी है। यह 'स्टॉकहोम सिंड्रोम' (Stockholm Syndrome) जैसी स्थिति है, जहाँ गुलाम को अपनी बेड़ियों से ही प्यार हो जाता है और वह आज़ादी के विचार से डरने लगता है। यह पूंजीवादी-सामंती शोषण की जड़ को छूता है, जहां 'सत्ता और लाभ' को बनाए रखने के लिए ‘असमानता’ जरूरी है। यह दक्षिणपंथी राजनीति का व्यवस्था संतुलन है।

                4. प्रति-प्रश्न का साहस (Revolution)

                -         "लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?"

                संवाद का आखिरी वाक्य पूरी व्यवस्था की बुनियाद को हिला देता है। यह सवाल भारतीय मानसिकता के उस 'Blind Spot' पर चोट करता है जहाँ लोग यह मान बैठे हैं कि सत्ता हमेशा 'Vertical' (ऊपर से नीचे) ही होनी चाहिए। यह सवाल राजतंत्र (Monarchy) की मानसिकता से निकलकर लोकतंत्र (Democracy) और समतावाद (Egalitarianism) की ओर बढ़ने का पहला कदम है। राजा को 'प्रजा' चाहिए होती है, जो हुक्म माने। लेकिन एक आधुनिक, प्रगतिशील समाज को 'नागरिक' चाहिए होते हैं, जिनके पास समान अधिकार हों। प्रति-प्रश्न की ताकत हो। यह ताकत संविधान देता है।

                भारतीय समाज भले ही कागज़ पर लोकतांत्रिक हो गए हैं, लेकिन मानसिक रूप से आज भी 'राजा-प्रजा' वाले सामंतवादी (Feudal) ढांचे से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। चाहे राजनीति हो, कॉर्पोरेट जगत हो या परिवार—हमेशा किसी 'मालिक', 'बॉस' या 'मसीहा' की तलाश में रहते हैं। जब तक "राजा बनाना ही क्यों है ?" के मूल सिद्धांत को नहीं समझेंगे, तब तक एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर पाएंगे जहाँ हर व्यक्ति को उसकी जाति, वर्ग या लिंग से परे हटकर सिर्फ एक 'इंसान' होने का सम्मान और अधिकार मिले। बदलाव की शुरुआत इसी सवाल से होती है। यह बदलाव का संघर्ष ही वामपंथी राजनीति का उत्स है।

 

संविधान ने जिसे 'नागरिक' बनाकर बराबरी का हक दिया, सामंतवाद आज भी उसे 'प्रजा' बनाकर पैरों तले कुचलने का संतुलन ढूंढ रहा है।

             आर्टिकल 15 मुख्यधारा के सिनेमा में दुर्लभ साहस का उदाहरण है। आर्टिकल 15 फिल्म एक प्रगतिशील कदम है जो दर्शकों को जातिवाद की क्रूरता से रूबरू कराती है। यह जागरूकता तो पैदा करती है, लेकिन वामपंथी बदलाव के लिए पर्याप्त नहीं -  जो व्यवस्था के मूलगामी विघटन की मांग करता है। हालाँकि यह पूंजीवादी मीडिया में दुर्लभ है।

आर्टिकल 15 ने रिलीज के समय व्यापक चर्चा उत्पन्न की। इसे जातिवाद और दलित उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मुख्यधारा के सिनेमा में साहसिक हस्तक्षेप माना गया। हालांकि कुछ ने दलित पात्रों को 'एजेंसी' न देने पर आलोचना की।

  • द हिंदू (The Hindu): फिल्म की समीक्षा में इसे “वाइल्ड, वाइल्ड हार्टलैंड” कहा गया। आलोचक नम्रता जोशी ने इसे एक थ्रिलर के रूप में सराहा, जिसमें अयन रंजन (आयुष्मान खुराना) की यात्रा के माध्यम से शहरी-शिक्षित वर्ग को जातिवादी वास्तविकता से रूबरू कराया गया है। निशाद (मोहम्मद जीशान अय्यूब) जैसे पात्रों की गहराई को रेखांकित किया गया है। फिल्म को सामाजिक परिवर्तन की जिम्मेदारी सवर्ण वर्ग पर डालने के लिए सराहा गया।

  • स्क्रॉल.इन (Scroll.in): फिल्म को “दलितों के खिलाफ अपराधों की शक्तिशाली जांच” बताया। इसे अनुभव सिन्हा का एक और साहसिक प्रयास माना, जो जातिगत हिंसा को बिना शर्म के उजागर करता है। स्क्रीनप्ले की क्रोधपूर्ण ईमानदारी की तारीफ की गई, हालांकि कुछ लेक्चरिंग और नायक-केंद्रित दृष्टिकोण पर टिप्पणी की गई।

  • इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express): फिल्म को “असंतोषजनक तत्वों के बावजूद जरूरी” बताया। इसे भुलाए गए मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाला साहसिक प्रयास माना, जो भारतीय समाज की नींव को चुनौती देता है।

  • अन्य प्रगतिशील/स्वतंत्र मीडिया (The Wire, HuffPost आदि): कई समीक्षाओं में इसे “न्यू इंडिया” की आलोचना और जाति-अंधता पर प्रहार माना गया। कुछ आलोचकों ने सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स की आलोचना की, लेकिन कुल मिलाकर इसे मुख्यधारा में दुर्लभ प्रगतिशील कदम के रूप में सराहा गया।

  • अनुभव सिन्हा के समकालीन प्रगतिशील फिल्मकारों ने फिल्म की सामाजिक प्रासंगिकता को व्यापक रूप से सराहा।

  • फिल्मकार समुदाय में इसे गोविंद निहालानी की परंपरा (जैसे अर्धसत्य) का विस्तार माना गया। कई प्रगतिशील फिल्मकारों ने इसे मुख्यधारा में सामाजिक मुद्दों को उठाने के साहस के लिए सराहा, हालांकि कुछ ने दलित पात्रों को एजेंसी न देने पर आलोचना की।

फिल्मकार अनुभव सिन्हा (जो प्रगतिशील दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं) ने फिल्म को “सवर्णों द्वारा सवर्ण प्रिविलेज को चुनौती देने” का माध्यम बताया। ब्राह्मण नायक चुनने का औचित्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने खुद माना कि ब्राह्मण नायक इसलिए चुना ताकि विशेषाधिकार प्राप्त (Privileged) वर्ग को यह अहसास कराया जा सके कि व्यवस्था को बदलने की जिम्मेदारी उनकी भी है।

कुल मिलाकर, प्रगतिशील हलकों में आर्टिकल 15 को 2019 के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक फिल्मों में गिना गया। इसे जातिवाद की संरचनात्मक हिंसा को उजागर करने का सशक्त प्रयास माना गया, भले ही कुछ कमियां (जैसे सवर्ण नायक-केंद्रित कथा और दलित पात्रों को 'एजेंसी' न देने की ) रही हों। फिल्म ने व्यापक बहस छेड़ी और दर्शकों को असहज किया, जो प्रगतिशील सिनेमा का मुख्य उद्देश्य है।

 

कास्ट (मुख्य): 

आयुष्मान खुराना-ए.एस.पी. अयन रंजन/ईशा तलवार-अदिति(अयन की पत्नी) /सयानी गुप्ता-गौरा /कुमुद मिश्रा-एस.आई. किसन जाटव /मनोज पाहवा -ब्रह्मदत्त सिंह /

नासीर -सी.बी.आई. अधिकारी 'पणिकर' / मोहम्मद जीशान अय्यूब — निशाद (सहायक भूमिका) 

 

क्रू (मुख्य): 

निर्देशक और निर्माता: अनुभव सिन्हा / लेखक:अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी / छायांकन: इवान मुलिगन / संगीत: अनुराग सैकिया, मंगेश धाकड़े आदि। 

प्रोडक्शन: बेनारस मीडिया वर्क्स और जी स्टूडियोज।

 

यह फिल्म देखने योग्य है, खासकर उन लोगों के लिए जो सामाजिक न्याय और वर्ग-जाति संघर्ष को समझना चाहते हैं। फिल्म आज भी सामाजिक न्याय की बहस में प्रासंगिक बनी हुई है।

और पढ़ें: हिन्दी फिल्म 'सतलुज' पर केशव भट्टड़ का समीक्षा लेख
पढ़ें समीक्षा और मुद्दा : कथाकार प्रेमचंद पर हिन्दी वृतचित्र " प्रेमचंद : एक जीवन "

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आर्टिकल 15 (2019)- राजा, प्रजा और संविधान: जब व्यवस्था का 'संतुलन' ही सबसे बड़ी हिंसा बन जाए - केशव भट्टड़

प्रकाशित: 24 जून 2026 • 13 मिनट पठन

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सिनेमा

'सिनेमा की पाठशाला में' ~ संजय मुखोपाध्याय ~

"सिनेमा जब केवल मनोरंजन न रहकर विचार का हथियार बन जाता है, तो सत्ता की नींद उड़ना स्वाभाविक है!" यह आलेख सिनेमा को केवल मनोरंजन के बजाय एक गंभीर विचार और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में देखता है। इसमें 'लेनिन' के काल से लेकर स्वतंत्र भारत में ('जवाहरलाल नेहरू' की पहल और 'सत्यजित राय-ऋत्विक घटक के योगदान से) FTII और SRFTI जैसे फिल्म शिक्षण संस्थानों के उदय और उनके इतिहास पर चर्चा की गई है। लेखक 'संजय मुखोपाध्याय' बताते हैं कि कैसे ये संस्थान नए और सचेत फिल्मकार तैयार करते हैं, जो व्यवस्था के सामने उसके खिलाफ सवाल खड़े करते हैं, और यही वजह है कि सत्ता इन सांस्कृतिक केंद्रों पर निरंतर हमले करती है।

16 अक्टूबर 2026

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सिनेमा

100वें साल में उत्तमकुमार -'अकेला आता है चाँद'~संजय मुखोपाध्याय

"फिल्मी परदे के साधारण फ्रेम से निकलकर जो इतिहास के फलक पर अमर हो गया, वही एकमात्र उत्तम है।" यह आलेख बांग्ला सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती के अवसर पर उनकी कला, लोकप्रियता और सांस्कृतिक प्रभाव का एक गंभीर विश्लेषण है। लेखक संजय मुखोपाध्याय बताते हैं कि बंगाली बुद्धिजीवियों ने लंबे समय तक उत्तम कुमार की लोकप्रियता को लेकर एक संकोच और अविश्वास का भाव रखा, क्योंकि वे इसे संभ्रांत कला के दायरे से बाहर मानते थे। इसके बावजूद, उत्तम कुमार केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि बंगाल की आधुनिकता, मध्यवर्गीय पहचान और सामूहिक सपनों के जीवंत प्रतीक बन गए। हॉलीवुड की मर्लिन मुनरो की तरह उन्होंने भी अपने दौर के सामाजिक और राजनीतिक तनावों के बीच खुद को ढाला। पटकथाओं की सीमाओं से परे जाकर अपने अनूठे अभिनय, देह-भाषा और सहजता से उन्होंने दर्शकों के दिलों पर राज किया। वे भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा बेजोड़ 'नक्षत्र' बनकर उभरे, जिनका प्रभाव आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना में अमिट है।

केशव कुमार भट्टड़ • 25 अक्टूबर 2026

सिनेमा

'सतलुज': अँधेरों को चुनौती देता सच - केशव भट्टड़

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के दबे हुए पन्नों को जिंदा करने के लिए बनाई जाती हैं। निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: घल्लूघारा / पंजाब '95) एक ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई अनुभव नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास और समकालीन भारतीय राजनीति का एक ऐसा विस्फोटक कोलाज है, जिसने सेंसरशिप से लेकर नेशनल सिक्योरिटी (राष्ट्रीय सुरक्षा) तक की कई बहसों को दोबारा जिंदा कर दिया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 जुलाई 2026

सिनेमा

'प्रेमचंद: एक जीवन':चेतना और मूल्यों की बेमिसाल मिसाल ~ केशव भट्टड़

यह तथ्य अत्यंत दुखद और विचारणीय है कि इतने गहन शोध, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक और इरफ़ान ख़ान जैसे शानदार अभिनेता की कलात्मक निष्ठा से निर्मित यह ऐतिहासिक फिल्म धरोहर आज प्रसार भारती (दूरदर्शन) के अभिलेखागारों (Archives) में कहीं धूल फाँक रही है। अफसर ना सुनते हैं, ना सुध लेते हैं , यहाँ तक कि अनगिनत पत्राचार और सुझावों के बावजूद इसे किसी भी डिजिटल या प्रसारण माध्यम पर उपलब्ध कराया जाना तो दूर की बात , ई-मेल और पत्रों का जबाब तक नहीं मिलता- छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त , अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक गुलबहार सिंह ने दुखी मन से बताया - यह एक गहरे अनैतिक - प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक - अपराध के समान है।
आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।

केशव कुमार भट्टड़ • 05 अगस्त 2026

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