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जन्मदिन पर श्रद्धांजलि - "सत्यजीत राय की फिल्मों में कामकाजी महिलाएँ: समाज परिवर्तन की सूचक - आरती, अदिति, कना" - पुनर्जित रायचौधरी

केशव कुमार भट्टड़02 मई 20267 मिनट पठन105 बार पढ़ा गया

सत्यजीत राय की फिल्मों में कामकाजी महिलाओं का जिक्र होते ही 'महानगर' (1963) की माधवी मुखर्जी की छवि आँखों के सामने तैरने लगती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह फ़िल्म एक बहुत महत्वपूर्ण मील का पत्थर है—लेकिन यह इकलौती फिल्म नहीं है। 'नायक' (1966), 'प्रतिद्वंद्वी' (1970) और 'जन-अरण्य' (1976) जैसी कई फिल्मों में कामकाजी महिलाओं के चरित्र चित्रण के माध्यम से, आजादी के बाद के भारत में नारी-श्रम और स्वतंत्रता पर सत्यजीत के शक्तिशाली नजरिए का महत्व और प्रासंगिकता बहुत अधिक है। इन पात्रों का उपयोग करके, सत्यजीत राय सीधे तौर पर बंगाली मध्यम वर्ग के सामाजिक और आर्थिक बदलाव को दिखाते हैं। वे यह भी बखूबी दर्शाते हैं कि कैसे बीसवीं सदी में महिलाओं का सार्वजनिक और पेशेवर दुनिया में प्रवेश पारंपरिक लिंग-भेद के नियमों को चुनौती देता है, पारिवारिक समीकरणों को बदलता है और पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है।

सत्यजीत राय की फिल्म 'नायक' में शर्मिला टैगोर और उत्तम कुमार 

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जन्मदिन पर श्रद्धांजलि

सत्यजीत राय की फिल्मों में कामकाजी महिलाएँ: समाज परिवर्तन की सूचक

- आरती, अदिति, कना

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-पुनर्जित रायचौधरी

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त्यजीत राय की फिल्मों में कामकाजी महिलाओं का जिक्र होते ही 'महानगर' (1963) की माधवी मुखर्जी की छवि आँखों के सामने तैरने लगती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह फ़िल्म एक बहुत महत्वपूर्ण मील का पत्थर है—लेकिन यह इकलौती फिल्म नहीं है। 'नायक' (1966), 'प्रतिद्वंद्वी' (1970) और 'जन-अरण्य' (1976) जैसी कई फिल्मों में कामकाजी महिलाओं के चरित्र चित्रण के माध्यम से, आजादी के बाद के भारत में नारी-श्रम और स्वतंत्रता पर सत्यजीत के शक्तिशाली नजरिए का महत्व और प्रासंगिकता बहुत अधिक है। इन पात्रों का उपयोग करके, सत्यजीत राय सीधे तौर पर बंगाली मध्यम वर्ग के सामाजिक और आर्थिक बदलाव को दिखाते हैं। वे यह भी बखूबी दर्शाते हैं कि कैसे बीसवीं सदी में महिलाओं का सार्वजनिक और पेशेवर दुनिया में प्रवेश पारंपरिक लिंग-भेद के नियमों को चुनौती देता है, पारिवारिक समीकरणों को बदलता है और पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है।

महानगर की आरती: आत्मविश्वास और नैतिकता की जीत

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'महानगर' में एक मध्यमवर्गीय गृहिणी आरती, आर्थिक रूप से तंग परिवार की मदद के लिए 'सेल्स गर्ल' की नौकरी करती है। सत्यजीत राय ने उसकी इस नौकरी को केवल आर्थिक आवश्यकता के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-खोज और सशक्तिकरण की एक प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया है। आरती का नौकरी करने का फैसला उसके परिवार की रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को विचलित कर देता है—यह फिल्म महिलाओं के घर की दहलीज से बाहर कदम रखने को लेकर होने वाले पारिवारिक तनावों को उजागर करती है। साथ ही यह दिखाती है कि कैसे वेतन वाली नौकरी धीरे-धीरे आरती में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और नैतिक स्वतंत्रता पैदा करती है।

आरती की इस 'मुक्ति' को फिल्म में रूमानी (Romantic) रूप में नहीं दिखाया गया है। उसका सशक्तिकरण मानसिक द्वंद्व के माध्यम से आता है। उसे पति के साथ रिश्तों का तनाव सहना पड़ता है, परिवार की आलोचना स्वीकार करनी पड़ती है और घरेलू व पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने में वह थक कर चूर हो जाती है। फिर भी फिल्म के अंत में, जब वह कार्यस्थल पर अन्याय और पक्षपात के विरोध में इस्तीफा दे देती है, तो आरती का चरित्र न केवल आर्थिक स्वतंत्रता, बल्कि नैतिक स्वायत्तता भी प्रदर्शित करता है। वह अपने आसपास के लोगों की तुलना में नैतिक रूप से अधिक मजबूत होकर उभरती है। कार्यस्थल पर महिलाओं का प्रवेश केवल पैसा कमाने का विषय नहीं है—यह गरिमा, स्वायत्तता और अपनी बात कहने का अधिकार हासिल करने की लड़ाई है।

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नायक की अदिति: एक आधुनिक बौद्धिक प्रतिपक्ष

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'नायक' में अदिति सेनगुप्ता के माध्यम से सत्यजीत राय कामकाजी महिला का एक अत्यंत शहरी और आधुनिक चित्रण पेश करते हैं। युवा अदिति 'आधुनिका' नाम की एक महिला पत्रिका की संपादक है; वह शिक्षित, स्पष्टवादी, स्मार्ट, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी है। वह आजादी के बाद के भारत में शहरी कामकाजी महिलाओं के एक नए वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। 'नायक' (सुपरस्टार अरिंदम मुखर्जी) की एक मूक प्रशंसक होने के बजाय, अदिति उसकी गहरी पर्यवेक्षक और आलोचक बन जाती है। वह अरिंदम की नैतिकता, महत्वाकांक्षा, असुरक्षा और समझौतों पर सवाल उठाती है, जिससे पारंपरिक लिंग-भेद का वह नियम पलट जाता है जहाँ पुरुष को 'देखने वाला' और महिला को 'देखी जाने वाली वस्तु' माना जाता है। फिल्म में अदिति एक संशयवादी और स्वतंत्र पत्रकार के रूप में दिखाई गई है, जो अपनी लंबी बातचीत के दौरान अरिंदम की अपनी धारणाओं और दर्शन को चुनौती देती है।

अदिति के चरित्र को जो बात विशेष बनाती है, वह है उसे मुख्य पुरुष पात्र के नैतिक और बौद्धिक प्रतिपक्ष के रूप में खड़ा करना। वह शांत, समझदार और भावनाओं पर नियंत्रण रखने वाली है; दूसरी ओर, अरिंदम अपनी प्रसिद्धि और पुरुषोचित आकर्षण के बावजूद धीरे-धीरे कमजोर और मानसिक रूप से टूटता हुआ दिखाई देता है। इसके माध्यम से सत्यजीत राय यह कहना चाहते हैं कि आधुनिक कामकाजी महिला का एक मौन अधिकार (authority) होता है, जो सामाजिक शक्ति से नहीं, बल्कि मेधा, पेशेवर व्यवहार और भावनात्मक परिपक्वता से पैदा होता है। साथ ही अदिति की मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि साठ के दशक के सामाजिक परिवेश में ऐसी महिलाएँ बिल्कुल अपवाद थीं। वास्तव में, अदिति पर्दे पर 'नायिका' न होकर भी लगभग नायिका का स्थान ले लेती है, क्योंकि उसके चरित्र का उस समय की आम महिलाओं से बहुत कम मेल था।

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प्रतिद्वंद्वी और जन-अरण्य: आर्थिक संकट और नैतिक चुनौतियाँ

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'प्रतिद्वंद्वी' में नायक सिद्धार्थ बेरोजगार है, जबकि उसकी छोटी बहन सुतपा नौकरी करती है। सुतपा का नौकरी करना पारंपरिक लिंग-भेद के नियमों का उल्टा चित्र पेश करता है—जहाँ शिक्षित पुरुष बेरोजगार और लक्ष्यहीन है, वहीं महिला परिवार की पालक बन जाती है। समाज का यह असामान्य चित्रण सिद्धार्थ को गहराई से परेशान करता है, जो बदलते सामाजिक-आर्थिक हालात में पुरुष के अहंकार के खोखलेपन को दर्शाता है। हालाँकि, सत्यजीत राय ने सुतपा की आर्थिक स्वतंत्रता को थोड़ा अस्पष्ट रखा है। उसकी नौकरी और जीवनशैली उसके चरित्र पर नैतिक संदेह पैदा करती है, और उसे लेकर परिवार की बेचैनी यह इशारा करती है कि समाज अक्सर स्वतंत्र महिलाओं को शक की नजर से देखता है। सत्यजीत राय उस समाज के पाखंड को उजागर करते हैं जो महिला की कमाई पर तो निर्भर है, लेकिन उसके घर से बाहर कदम रखने पर उसे आंकने (judge करने) के लिए हमेशा तैयार रहता है।

इसी फिल्म का एक और पात्र एक नर्स है, जिसके फ्लैट पर सिद्धार्थ का दोस्त उसे ले जाता है। वह नर्स और यौनकर्मी (Sex worker) की दोहरी भूमिका में है, जो गहरे रूप से प्रतीकात्मक है। एक तरफ वह उन शहरी महिलाओं की आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाती है जिन्हें जीवित रहने के लिए सम्मानजनक नौकरी के साथ 'कलंकित' काम करने पर मजबूर होना पड़ता है। दूसरी ओर, उसका चरित्र समाज में सम्मान और निंदा के बीच की उस धुंधली रेखा को उजागर करता है जो गरीबी और हताशा के कारण मिट जाती है।

यही निराशाजनक चित्र 'जन-अरण्य' में भी दिखता है। फिल्म के चौंकाने वाले अंत में पता चलता है कि एक ग्राहक की मांग पूरी करने के लिए फिल्म का मुख्य पात्र सोमनाथ (जो एक अच्छा छात्र होने के बावजूद दलाल बन चुका है) अनजाने में जिसे होटल पहुँचाता है, वह उसके दोस्त की बहन कना है। उसके इस काम में आने को एक नैतिक विफलता के रूप में नहीं, बल्कि एक मजबूर आर्थिक जरूरत के रूप में दिखाया गया है। गिरती हुई अर्थव्यवस्था में जहाँ बाजार पुरुषों को सम्मानजनक नौकरियों से वंचित करता है, वहीं महिलाओं के शरीर को एक वस्तु (commodity) बना देता है। 'महानगर' की आरती के आशाजनक सशक्तिकरण के विपरीत, कना पूंजीवाद के तहत महिला श्रम के काले पक्ष को दर्शाती है।

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कामकाजी महिलाओं के इन प्रत्यक्ष चित्रणों के साथ-साथ, सत्यजीत राय ने 'घरे बाइरे' (1984) में भी महिला-मुक्ति के बड़े सवाल को बहुत बारीकी से टटोला है। हालाँकि यह फिल्म पारंपरिक अर्थों में महिला श्रम के बारे में नहीं है, लेकिन बिमला का घरेलू दुनिया से बाहरी दुनिया में कदम रखने का पल आरती, अदिति, सुतपा और कणा के संघर्षों की शुरुआत जैसा ही लगता है। सत्यजित राय बताते हैं कि कार्यस्थल पर प्रवेश करने से बहुत पहले, कई सामाजिक बाधाओं को पार करके महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपनी दृश्यता और अधिकार स्थापित करना पड़ा था।

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[लेखक अर्थशास्त्र विभाग, शिव नादर विश्वविद्यालय से जुड़े हैं।[
साभार : आनंदबाज़ार पत्रिका 01. 05. 2026

सखेद नोट: फोटो में सत्यजित की जगह सत्यजीत पढ़ें। 

अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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केशव कुमार भट्टड़10 अप्रैल 2026

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आर्टिकल 15 (2019)- राजा, प्रजा और संविधान: जब व्यवस्था का 'संतुलन' ही सबसे बड़ी हिंसा बन जाए - केशव भट्टड़

फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।

इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।

“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।

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