शरदोत्सव के दिनों में हमारे अभूतपूर्व संघर्ष की यह पृष्ठभूमि कोई एक दिन में तैयार नहीं हुई थी, भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही इसका प्लॉट सजाया जाना शुरू हो गया था। भाजपा बहुत अच्छी तरह जानती है कि सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद उनकी असली विरोधी शक्ति केवल कम्युनिस्ट ही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जन्मलग्न से ही उनकी स्पष्ट घोषणा रही है, संघ के मूल तीन शत्रु हैं: मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट। उसी कारण सत्ता में आते ही उन्होंने कम्युनिस्टों की लंबे समय से पोषित परंपरा, संस्कृति और विचारधारा पर प्रहार करना शुरू कर दिया। तथाकथित सनातनी धारणाओं का धुआँ उठाकर वे यह जताना चाहते हैं कि जो भी वामपंथी है या जो भी उनके विचारधारा से परे है, वही भारत-विरोधी है। वामपंथ का मतलब मानो देशप्रेमहीनता है, वामपंथ का मतलब मानो देशद्रोह है! 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' इस तरह के गढ़े गए नारों का झूठा आरोप देकर वे आम लोगों के मन में जहरीला द्वेष भरने का लगातार प्रयास करते रहे हैं।
हालाँकि हम पहले से ही जानते थे कि इस जनविरोधी भाजपा सरकार का असली निशाना बंगाल के मेहनतकश, आम कामकाजी लोग हैं। सत्ता में आए एक महीना भी नहीं हुआ था कि पहला प्रहार निर्दोष हॉकरों और झुग्गी-झोपड़ी के बाशिंदों पर हुआ। जब कोई अन्य राजनीतिक ताकत सड़क पर खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, तब कम्युनिस्टों ने ही पूरी ताकत से व्यापक एकता और जनमंच का गठन कर लोगों को बचाने के लिए मोर्चा संभाला। यह संघर्ष बंगाल के एक छोर से दूसरे छोर तक फैल गया। जनता के उस अडिग प्रतिरोध के सामने उन्हें कई जगहों पर पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। प्रशासन और अदालत को हथियार बनाकर भी हर जगह गरीबों की रोजी-रोटी छिनना या झुग्गियों को ढहाना उनके लिए संभव नहीं हुआ। दरअसल, इनका असली उद्देश्य बंगाल को गुजरात की तर्ज पर अडानी-अंबानी के हाथों में बेचना है। ठीक इसी कारण से गंगा के तटीय इलाकों से लेकर कोलकाता के प्राणकेंद्र की मूल्यवान जमीन से गरीब लोगों को बेदखल कर अडानी के हाथों में सौंपा जा रहा है। पूरे राज्य में आज गरीबों को उजाड़ने का एक बर्बर कार्यक्रम चल रहा है।
भाजपा सरकार के कायम होने के कुछ ही महीनों के भीतर दरवाजे पर बंगाल का प्राणप्रिय शरदोत्सव आ गया। यह उत्सव सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है यह धर्म, वर्ण, जाति और भाषा से परे तमाम इंसानों के मिलन का महाउत्सव है। 'धर्म जिसका तिसका, उत्सव सबका' यह चिरंतन भाव ही बंगाल की हजारों साल पुरानी परंपरा है। उस आनंद में सराबोर होने के लिए धर्म की परवाह किए बिना हर बंगाली-गैर-बंगाली इंसान साल भर तैयारी करते हैं। नए कपड़ों की महक, आनंद, खान-पान और जाने-पहचाने व अनजाने लोगों के महामिलन से यह मानो एक अंतहीन प्राणों का मेला है।
लेकिन इस आनंद को भी भाजपा बर्दाश्त नहीं कर पाई। उत्सव के उस धर्मनिरपेक्ष और मुक्त माहौल पर उन्होंने शुरुआत से ही जहरीला आक्रमण साधना शुरू कर दिया। दूसरे राज्य से आए बागेश्वर बाबा से लेकर स्थानीय भाजपा नेताओं तक ने हुंकार भरना शुरू कर दिया, शरदोत्सव मानो सिर्फ सनातनी हिंदुओं का है, यहाँ किसी विधर्मी या प्रगतिशील इंसान का कोई स्थान ही नहीं है! उत्तर भारतीय रीति-रिवाज थोपकर शाकाहारी भोजन खाने का फरमान, नवरात्रि जैसे आचरणों का पालन करने का तालिबानी फतवा देकर वे बंगाल के प्राणों से भरे उत्सव के माहौल को विषैला बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें समझ आया कि बंगाल के लोग इस अनुशाशन को नहीं मानेंगे और वामपंथी ही इस अन्याय के खिलाफ सबसे पहली दीवार बनकर खड़े होंगे, तभी उनके आक्रमण का मुख्य लक्ष्य वामपंथी बन गए।
खुद मुख्यमंत्री की तरफ से फरमान जारी हुआ—किताबों के स्टॉल पर 'शरदोत्सव' नहीं लिखा जा सकता, 'दुर्गोत्सव' या 'दुर्गापूजा' लिखना होगा; वरना स्टॉल ही नहीं खोलने दिया जाएगा! 'राजा जो कहता है, दरबारी उसका सौ गुना कहते हैं' शासक के चाकर दरबारी गला फाड़कर कहने लगे कि जो नास्तिक हैं, धर्म को नहीं मानते, वे पूजा के समय किताबों का स्टॉल क्यों लगाएंगे? उनका दावा है कि वामपंथियों के स्टॉल में सिर्फ लेनिन, स्टालिन और मार्क्स की रचनाएँ होती हैं, जिनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। इन किताबों को नष्ट कर भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी होगी! सिर्फ इतना ही नहीं, बुकस्टॉल के विरोध में 'वामवध' के होर्डिंग लगाकर प्रचार किया गया कि स्टॉल लगाने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि इसके बजाय महिलाओं के हाथों में तलवार और त्रिशूल थमा दिए जाने चाहिए, वही असली समाजसेवा है!
इसी अंधे आक्रोश ने भाजपा के आक्रमण को शिक्षा के आँगन तक पहुँचा दिया। जादवपुर विश्वविद्यालय, सत्यजित रे फिल्म इंस्टीट्यूट, प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी जैसे ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों को एक-एक करके निशाना बनाया गया। शिक्षकों का तबादला करने के लिए नया काला कानून पास किया गया। क्योंकि वे जानते हैं कि शिक्षा ही राष्ट्र की रीढ़ है। इंसान जितना जानेगा, जितना पढ़ेगा, उतना ही वह समाज को पहचानेगा, शोषण के स्वरूप को बेनकाब करेगा और कुछेक लोगों के हाथों करोड़ों इंसानों के सर्वस्व लुटने के खेल को पकड़ लेगा। इसलिए वे नहीं चाहते कि लोग जागरूक हों। उनका उद्देश्य लोगों को एक खास खाँचे में शिक्षित करना, इतिहास को पूरी तरह विकृत कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हिंदू महासभा के नेताओं को स्वतंत्रता संग्राम का एकमात्र नायक के रूप में पेश करना है। और इसी कारण से सभी प्रगतिशील विचारों की किताबों पर उनका इतना गुस्सा, इतनी नाराजगी है।
वे कितने अमानवीय और बर्बर हो सकते हैं, यह लोगों ने अब अपनी आँखों के सामने देखा। शरदोत्सव में वामपंथियों के किताबों के स्टॉल कोई नई घटना नहीं है। यह परंपरा साल 1952-53 से चली आ रही है। पुलिस-प्रशासन को तय नियमों के तहत चिट्ठी दी जाती है, नगरपालिका इलाके में निर्धारित टैक्स जमा किया जाता है, बिजली बोर्ड या सीईएससी से अलग मीटर लाकर बिजली जलाकर यह स्टॉल खोला जाता है। यह स्टॉल केवल राजनीतिक प्रचार की जगह नहीं है, यह स्वस्थ संस्कृति के मिलन की जगह है। पूजा के पंडालों में ठाकुर देखने के साथ-साथ लोग किताबें खरीदते हैं, नए कपड़ों की तरह नई किताबें खरीदना बंगाल की एक अटूट परंपरा है। शारदीय पत्रिकाओं, नई कहानियों, कविताओं और उपन्यासों के माध्यम से साहित्यप्रेमी लोग उत्सव का स्वागत करते हैं। इस समय हजारों नई रचनाओं का जन्म होता है।
इस बार उस मुक्त चिंतन के प्रतीक किताबों के स्टॉल पर बर्बर हमला बोला गया। पूरे कोलकाता और राज्यभर में जहाँ भी भाजपा की ताकत है, जहाँ भी वे 20-30 असामाजिक तत्वों को इकट्ठा कर पाए हैं, वहीं बुकस्टॉल तोड़ डाले गए हैं।
नागरबाजार, बैरकपुर, लेक गार्डेंस, इंटाली आदि सभी जगहों पर लगभग डेढ़ सौ से अधिक स्टॉलों पर तांडव किया गया। सिर्फ स्टॉल तोड़ना ही नहीं, बल्कि किताबों को फाड़कर चीथड़े-चीथड़े कर सड़कों पर बिखेर दिया गया। शरतचंद्र के 'पथेर दाबी' से लेकर बंकिमचंद्र के 'आनंदमठ' तक, किसी भी चीज को इन पाखंडियों के हाथों से मुक्ति नहीं मिली।
कैसा विकृत उल्लास है! मानो ठीक जर्मन नात्सी के तरीके से राइखस्टाग में आग लगाने के बाद कम्युनिस्टों पर हमला और खुलेआम किताबें जलाने का वह अंधकारमय इतिहास फिर से लौट आया है। इस उन्माद के साथ-साथ वामपंथी कार्यकर्ताओं पर भी सीधे तौर पर शारीरिक हमले किए गए। लेकिन बंगाल के लोग झुके नहीं। पूरे पश्चिम बंगाल में जहाँ भी हमला हुआ, वहीं लाल झंडा थामे वामपंथी कार्यकर्ता डटकर खड़े हो गए। उसी अडिग प्रतिरोध के चलते एक के बाद एक स्टॉल फिर से सिर उठाकर खड़े हो गए। जाधवपुर के 8बी बस स्टैंड पर जब बुलडोज़र और कचरा ढोने वाली कॉरपोरेशन की गाड़ियाँ किताबों को कचरे की तरह फेंकने के लिए लाई गईं, जब सैकड़ों पुलिस और अर्धसैनिक बलों को तैनात कर बुकस्टॉल तोड़ने का षड्यंत्र रचा गया, तब आम लोग और वामपंथी सीना ताने बुलडोज़र के सामने खड़े हो गए। लाल झंडे की उस लौह-कठिन बाधा के सामने प्रशासन और उसके बुलडोज़र को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। लोगों के सम्मिलित प्रतिरोध के सामने फासीवाद की हेकड़ी चूर-चूर हो गई। दूसरी तरफ, अजीब बात यह है कि इस वर्ष नए-नवेले भगवा खेमे के शाखा संगठनों के बुकस्टॉल बिना किसी बाधा के चलते रहे—उनके ऊपर प्रशासन ने हाथ तक नहीं लगाया।
इस साल किताबों पर प्रहार हुआ है, किताबों के पन्नों पर लातें मारी गई हैं, स्टॉल जलाए गए हैं। लेकिन हम बंगाल के तमाम आम जनता को सलाम करते हैं। जितना ज्यादा हमला हुआ, किताबों से प्रेम करने की चाहत ने लोगों के मन में उतनी ही तेजी से आग जला दी। आम लोगों ने समझा कि यह आक्रमण सिर्फ एक स्टॉल पर नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति और अंतरात्मा पर है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक अब तक 227 से ज्यादा बुकस्टॉल हमलों का शिकार हुए हैं, जिनमें से शायद कुछेक ही अस्थायी रूप से बंद हुए हैं, लेकिन बाकी सभी जगहों पर लोगों ने खुद पहरा देकर स्टॉल चालू रखे। पुलिस और भाजपा मिलकर जिसे बंद करना चाहते थे, लोगों ने उसे दोगुने उत्साह के साथ बचाए रखा।
क्या हमले करके स्टॉलों की संख्या कम की जा सकी है? बिल्कुल नहीं। जिन जिलों का हिसाब मिला है, उससे पता चलता है कि पिछली बार की तुलना में इस बार स्टॉलों की संख्या काफी बढ़ी है! और किताबों की बिक्री का हिसाब तो सारे रिकॉर्ड तोड़ चुका है। अकेले जादवपुर के 8बी स्टॉल पर जहाँ पिछले साल करीब साढ़े चार लाख रुपये की किताबें बिकी थीं, वहीं इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए यह 16 लाख रुपये से भी ज्यादा हो गई है! पूरे राज्य में किताबों की बिक्री डेढ़ गुने से भी ज्यादा बढ़ गई है।
हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पुलिस की तरफ से सभी स्टॉल बंद कराने की तत्परता दिखाई गई। क्या कोई ऐसा फैसला है जिसके तहत बंगाल में बुकस्टॉल नहीं लगाए जा सकते? जिस फैसले का हवाला दिया जा रहा है, वह विशेष रूप से बनगाँव की एक घटना के संदर्भ में था। फिर भी वे लोग उसी बहाने पुलिस, अर्धसैनिक बलों और कचरे की गाड़ी को लेकर किताबें हटाने आ धमके। क्या किताबें इनकी नजरों में कचरा हैं? इससे बड़ी फासीवादी मानसिकता और क्या हो सकती है? जादवपुर के स्टॉल में नियमों के तहत सीईएससी का कनेक्शन लिया गया था, पुलिस-प्रशासन को नियमानुसार सूचित किया गया था। ये उपद्रव कर सकते हैं, यह समझकर इस बार कार्यकर्ता और भी ज्यादा सतर्क थे। सड़क के किनारे जब सैकड़ों कपड़ों की दुकानें लग सकती हैं, अन्य अस्थायी स्टॉल लग सकते हैं, तो बुकस्टॉल में किस बात की बाधा? जादवपुर में हमारे स्टॉल के ठीक बगल में भगवे रंग में रंगकर एक नया स्टॉल लगाया गया था। उनका स्टॉल तो था ही, लेकिन वहाँ किताबें नहीं थीं, किताबें पढ़ने वाले लोग नहीं थे, किताब प्रेमियों की कोई भीड़ नहीं थी।
इन आक्रमणकारियों को शर्म आनी चाहिए। किताबें जलाकर उनका क्या फायदा हुआ? लोग दूर-दूर से सिर्फ किताबें खरीदने के लिए जादवपुर चले आए। आम लोगों ने आकर गुस्से में कहा, 'किताबों के स्टॉल पर हमला करेंगे? इंटरनेट पर वैसी तस्वीरें देखी हैं, इसीलिए आज हम यहाँ किताबें खरीदने आए हैं!' ठाकुर देखने के साथ-साथ लोगों ने लाइन लगाकर किताबें खरीदते हुए प्रतिरोध गढ़ा है। हमारे बुकस्टॉल में क्या नहीं होता? वहाँ मार्क्सवादी साहित्य तो होता ही है, साथ ही बच्चों की परियों की कहानियाँ, किशोर साहित्य, विज्ञान, रवींद्रनाथ, शरतचंद्र, मानिक बंद्योपाध्याय से लेकर स्वामी विवेकानंद, आदि शंकराचार्य या गौतम बुद्ध का दर्शन भी होता है। इंसान को जिसकी जरूरत है, जो उनकी चेतना को जगाता है, वे सभी किताबें वहाँ होती हैं।
'वाम वध' और 'पुस्तक वध' की जो हिंसक राजनीति शुरू हुई है, उसका अंत बहुत भयानक होने वाला है। बंगाल के समझदार और नेकनीयत लोग इस ढिठाई को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। दुर्गोत्सव के नाम पर लोगों की मौत का कारण बनना, पूजा समितियों पर कब्जा करना, दो बार खूंटी पूजा करके मुख्यमंत्री द्वारा अपनी सस्ती लोकप्रियता जाहिर करना और दरबारियों के जरिए अपने स्टॉल को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार दिलवाने की जो राजनीति चल रही है, उसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को ही लेनी होगी।
बंगाल ने कभी भी बाहर से थोपे गए निर्देशों या तालिबानी अनुशासन को नहीं माना है, आज भी नहीं मानेगा। हम पूजा में क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, क्या पढ़ेंगे, यह तय करने का अधिकार किसी भी ताकत के पास नहीं है। यही वजह है कि बुकस्टॉल के साथ-साथ बंगाल की हर गली में मांस, मछली और बिरयानी की दुकानों में भी इस बार रिकॉर्ड बिक्री हुई। लोगों ने भरपेट अपनी पसंद का खाना खाकर इस सांप्रदायिक फतवे के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। जो लोग इंसानों को कुपमंडूकता के अंधेरे में कैद कर समाज को ऊपर से नियंत्रित करने की कोशिश करते रहे हैं, वे इतिहास के पन्नों में धूल में मिल गए हैं। विश्व इतिहास गवाह है कि फासीवाद की हेकड़ी जब हद से बढ़ जाती है, तब आम लोग खुद सड़कों पर उतरकर इनकी अकड़ तोड़ देते हैं। हम हिटलर और मुसोलिनी का अंत नहीं भूले हैं। आखिरी वक्त में अपने बनाए बंकर में घुसकर अपनी कनपटी पर रिवॉल्वर रखकर हिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी थी, और गुस्से से भरे आम लोगों ने मुसोलिनी को सरेआम लैम्पपोस्ट पर लटका दिया था। बंगाल की धरती पर जो लोग किताबें जलाने की राजनीति कर रहे हैं, उनके लिए भी भविष्य में वही इतिहास प्रतीक्षा कर रहा है।
आइए, धर्म और वर्ण के भेदों को भुलाकर, प्रगतिशील वामपंथियों और साधारण नेकनीयत लोगों की एक अडिग एकता कायम कर इस बर्बर फासीवादी ताकत के खिलाफ सर्वव्यापी संघर्ष में शामिल हों। किताबों की जय हो, मनुष्यों की जय हो!
लेखक परिचय: कॉमरेड सुदीप सेनगुप्ता सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी के सदस्य है
साभार: गणशक्ति
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...