अब तुम आज़ाद हो
तुम्हें पूरी दुनिया को
रास्ता दिखाना है
जन समाचार मंच
अब तुम आज़ाद हो
तुम्हें पूरी दुनिया को
रास्ता दिखाना है

वे मुट्ठी भर थे
पर ज़ोर से चिल्लाए
एकस्वर में चिल्लाए
अरे!
इसके माथे पर तो
तिलक था
किसने मिटा दिया
कितना पवित्र निशान था
किसने हटा दिया
अरे!
इसके तो हाथ
बंधे हुए हैं
(जबकि हाथ प्रार्थना में
जुड़े हुए थे)
अरे!
इसकी आंखें तो
मुंदी हुई है
(वह ध्यानमग्न था)
अरे!
इसके तो पैर
टूटे हुए हैं
(पैर चलने के लिए
उठे हुए थे)
देखो तो
कितना कमज़ोर
हो गया है
(वे देह देख रहे थे
आत्मबल नहीं)
अब इसका क्या होगा
यह तो कुछ दिनों में
मर ही जाएगा
वे दिन-रात
चिल्लाते रहे
थोड़े -थोड़े
तमाशबीन जुटने लगे
फिर वे सभी
मिलकर चिल्लाने लगे
उनके गुरु ने कहा था
चिल्ला चिल्लाकर
बोला गया
सफ़ेद झूठ भी
रंगीन सच बन जाता है
गुरु कभी ग़लत नहीं होता
भीड़ बढ़ती गई
लोग चिल्लाते रहे
शोर मचाते रहे
और एक दिन
उसे
इनके हवाले
कर दिया गया
इन्होंने
सबसे पहले
उसकी पलकें नोच कर
दोनों आंखें
फोड़ दीं
प्रार्थना में जुड़े
हाथों को
कुहनी पर से
काट दिया
सिर तोड़ कर
भीतर से दिमाग़
निकाल लिया
सारे फ़साद की जड़
यह दिमाग़ ही तो था
पूरे चेहरे पर
रंग-रोगन सजाकर
मुंह से भी बड़ा
तिलक लगा दिया
घुटने तक
दोनों पैर काट दिए
वह चिल्लाया नहीं
क्योंकि
ज़बान पहले ही
खींच ली गई थी
गले में लटका दिया गया
पांच किलो अनाज का
फटा झोला
और
उससे कहा गया
देखो!
तुम्हें उन सबके साथ
तेज़ दौड़ कर
सबसे आगे जाना है
इतना कहकर
उसे वहीं छोड़कर
वे मुट्ठी भर लोग
अपने लोगों के साथ
उस ओर दौड़ पड़े
जहां से
सूरज निकलने की
संभावना थी
एक ऊंचे पहाड़ पर
चढ़कर
वे ज़ोरों से चिल्लाने लगे
एक स्वर में
उसकी प्रशंसा के
गीत गाने लगे
वह
कटे हाथों और पैरों से
दिशाहीन
घिसट घिसट कर
आगे बढ़ने की
कोशिश करने लगा
जगह जगह से
बदन छिल गया
लहू सूखकर
काले पड़ गए
उसे कुछ सूझ नहीं रहा
बस
वह उस आवाज़ की
दिशा में
रेंगता जा रहा था
दूर ऊंचे पहाड़ों से
एक स्वर में
चीख़ती आवाज़ें आ रही थीं
शाबास!
अब तुम आज़ाद हो
तुम्हें पूरी दुनिया को
रास्ता दिखाना है
अपने स्वर्णिम अतीत
को याद करो
बीते वैभव को
याद करो
और दौड़ पड़ो
पूरी दुनिया की
निगाह तुम पर है
ऐ हमारी आशा के दीप!
वहां तक तो आओ
जहां हम खड़े हैं
आ जाओ !
हम तुम्हें बताएंगे
आज़ादी का सही अर्थ!
- हूबनाथ
[लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
अपलोडर: VKA-N9LYCE
क्या यह लेख उपयोगी था?
अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 16 अगस्त 2026 • 3 मिनट पठन

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
कुछ घंटे पहले

उग्र राष्ट्रवाद का गुणगान करते हुए आरएसएस और भाजपा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को छोटा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बड़ा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। पहनावे और खान-पान जैसी चीजों को लेकर भी लोगों के बीच बंटवारा किया जा रहा है। आम जनता दैनिक जीवन की जरूरतों और समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन फिर भी उन्हें एक-दूसरे से अलग करने की साजिश चलाई जा रही है।
24 अगस्त 2026

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन ने अग्निमित्रा पॉल की निंदा की
24 अगस्त 2026

मोहम्मद सलीम • 25 अप्रैल 2026

नीट महाघोटाला: 'डार्लिंग' से 'डेथ' तक का मंजर
"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए,तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।
आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"
केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।
इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।
इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।
केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...