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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

केशव कुमार भट्टड़20 मई 20268 मिनट पठन160 बार पढ़ा गया

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए

गार्गी चटर्जी

मात्र कुछ ही दिन पहले पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन हुआ है। नई सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही प्रशासनिक सक्रियता के नाम पर एक के बाद एक उन्मूलन (उच्छेद, हटाने का) अभियान शुरू हो गया है। फुटपाथ को कब्जामुक्त करने के बहाने हॉकरों को हटाना, तथाकथित "अवैध निर्माण" को बुलडोजर से ढहा देना, स्टेशन परिसर से छोटी दुकानों को हटा देना—ये सब जैसे नए शासन की पहली राजनीतिक भाषा बन गए हैं। हालांकि, अदालत ने पहले ही साफ कर दिया है कि कानून को दरकिनार करके कोई भी उच्छेद अभियान नहीं चलाया जा सकता। यानी, प्रशासन जिस तरह से आगे बढ़ रहा था, वह खुद कानून की सीमा को पार कर रहा था।

इस स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित मेहनत-कश आम लोग हो रहे हैं—विशेषकर हॉकर। चाहे सड़क के हॉकर हों या रेलवे के हॉकर, आजीविका के सवाल पर आज वे एक भयानक अनिश्चितता के मुहाने पर खड़े हैं। हावड़ा और सियालदह स्टेशन परिसर में हाल ही में जो उच्छेद अभियान चलाया गया है, वह सिर्फ कुछ स्टालों को तोड़े जाने की घटना नहीं है; इसके साथ हजारों परिवारों का भरण-पोषण, जीने की लड़ाई और व्यापक आर्थिक नीति की क्रूर वास्तविकता जुड़ी हुई है।

सियालदह के कोले मार्केट के मूड़ी (लाइ/मुरमुरा) व्यवसायी बिनय मंडल की ही बात ले लीजिए। उनके नियमित खरीददार झालमूड़ी बेचने वाले थे, जो हर दिन स्टेशन पर बैठकर या ट्रेनों में घूम-घूमकर अपनी आजीविका कमाते थे। उच्छेद के बाद वे अब नहीं आ रहे हैं। नतीजतन, उनका व्यवसाय भी व्यावहारिक रूप से बंद है। यानी, जब एक हॉकर प्रभावित होता है, तो उसका असर कई अन्य छोटे व्यापारियों और कामकाजी लोगों पर पड़ता है। आजीविका की इस श्रृंखला को समझे बिना "साफ शहर" या "विकास" के नाम पर चलाया जा रहा उच्छेद अभियान असल में समाज के एक बड़े कामकाजी हिस्से को बर्बादी की ओर धकेल रहा है।

उपहास तो यह है कि—जिस प्रधानमंत्री के बारे में कभी यह प्रचार किया गया था कि वे स्टेशन पर चाय बेचते थे, उसी सरकार के कार्यकाल में आज रेल हॉकरों के खिलाफ सबसे संगठित हमला चल रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान झालमूड़ी विक्रेता से झालमूड़ी खरीदकर खाने की तस्वीरें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिनों-दिन प्रचारित की जाती हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही—हकीकत में उन्हीं झालमूडी विक्रेताओं को हटाया जा रहा है, यह दोहरापन आज बिल्कुल साफ है।

असल में समस्या की जड़ें और गहरी हैं। हॉकर उच्छेद का सवाल महज प्रशासनिक नहीं है; यह आर्थिक नीति का सवाल है। पिछले एक दशक में भारतीय रेलवे को कदम-दर-कदम निजीकरण की राह पर आगे बढ़ाया गया है। “अमृत भारत स्टेशन” परियोजना के नाम पर देश के स्टेशनों को चमचमाते वाणिज्यिक केंद्रों में बदलने की योजना बनाई गई है। एस्केलेटर, एयर-कंडीशंड वेटिंग रूम, ब्रांडेड शॉपिंग ज़ोन, फूड कोर्ट—सबकी व्यवस्था होगी। लेकिन सवाल यह है कि यह विकास किसके लिए है?

जो दैनिक यात्री (कम्यूटर) सुबह-सुबह ट्रेन में लटककर दफ्तर जाता है, सड़क के हॉकर हों या रेलवे के हॉकर, आजीविका के सवाल पर आज वे एक भयानक अनिश्चितता के मुहाने पर खड़े हैं। हावड़ा और सियालदह स्टेशन परिसर में हाल ही में जो उच्छेद अभियान चलाया गया है, वह सिर्फ कुछ स्टालों को तोड़े जाने की घटना नहीं है; इसके साथ हजारों परिवारों का भरण-पोषण, जीने की लड़ाई और व्यापक आर्थिक नीति की क्रूर वास्तविकता जुड़ी हुई है।

जो मजदूर कम पैसों में रोजाना सफर करता है, उनके जीवन में इस तथाकथित विकास की वास्तविक उपयोगिता कितनी है? बल्कि डर यह है कि इस विकास का खर्च आखिरकार आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा। किराया बढ़ेगा, सस्ती सेवाएं कम होंगी, और रेलवे धीरे-धीरे सार्वजनिक परिवहन से कॉर्पोरेट मुनाफा आधारित सेवा में बदल जाएगी।

इस कॉर्पोरेट मॉडल की सबसे बड़ी "समस्या" हॉकर हैं। क्योंकि वे चमचमाती शॉपिंग मॉल संस्कृति में फिट नहीं बैठते। अगर किसी स्टेशन पर महंगे कॉफी शॉप, ब्रांडेड आउटलेट और कॉर्पोरेट दुकानें खोली जाएंगी, तो वहां गरीब आदमी की पांच रुपये की चाय या दस रुपये की झालमूड़ी के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। नतीजतन, विकास की पहली मार हॉकरों पर पड़ती है।

आज रेल हॉकरों के खिलाफ जो चल रहा है वह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, आरपीएफ (RPF) के लगातार अभियान, केस, जुर्माना, जबरन वसूली, सामान नष्ट करना, स्टॉल तोड़ना, यात्रियों के सामने हॉकरों को "अवैध" कहकर प्रचारित करना—यह सब वास्तव में रेलवे को कॉर्पोरेट नियंत्रण में सौंपने की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है।

साल 2015 में विवेक देबरॉय समिति की सिफारिशों में भारतीय रेलवे के "उदारीकरण" या बाजार-उन्मुख पुनर्गठन की बात कही गई थी। हालांकि सीधे तौर पर "निजीकरण" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था, लेकिन रिपोर्ट का मुख्य बिंदु रेलवे की विभिन्न सेवाओं, रखरखाव, टिकटिंग, स्टेशन विकास, सुरक्षा—सभी क्षेत्रों में निजी पूंजी के प्रवेश को बढ़ावा देना था। बाद में रेल बजट को आम बजट में मिला देना, स्टेशनों के पुनर्विकास के लिए कॉर्पोरेट कंपनियों को दीर्घकालिक लीज पर देने का निर्णय, 109 मार्गों पर निजी ट्रेनें चलाने की पहल—यह सब उसी नीति की निरंतरता है।

अब सवाल यह है कि—क्या यह विकास वाकई आम लोगों के लिए है?

जब अधिकांश स्टेशनों पर टिकट काउंटर अपर्याप्त हैं, सब-वे गंदे हैं, एस्केलेटर खराब हैं, ट्रेनें समय पर नहीं चलती हैं, अत्यधिक भीड़ के कारण लोग हर दिन दुर्दशा झेलते हैं—तब चमचमाते स्टेशनों का निर्माण क्या वास्तविक समस्या का समाधान है? या लोगों का ध्यान भटकाने की रणनीति है?

असल में इस विकास का लक्ष्य आम यात्री नहीं हैं; इसका लक्ष्य कॉर्पोरेट मुनाफा है। स्टेशन को शॉपिंग मॉल में बदलना, वाणिज्यिक हब में तब्दील करना, जमीन और संपत्ति को पूंजीपतियों के हाथों में सौंपना—इस पूरी प्रक्रिया में कामकाजी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए हॉकरों को हटाना इस परियोजना का एक अभिन्न हिस्सा है।

लेकिन क्या राज्य सरकार यह भूल सकती है कि हॉकर भी कामकाजी लोग हैं? जो व्यक्ति पेट पालने के लिए सड़कों पर उतरता है, क्या उसके लिए 10-20 लाख रुपये देकर दुकान खरीदना संभव है? जब उसे कोई स्थायी जगह नहीं दी जाती, लाइसेंस नहीं दिया जाता, तो सड़क ही उसका एकमात्र सहारा होती है। तो फिर अगर वह व्यक्ति सड़क पर बैठता है, तो उसकी गलती कहाँ है?

इसी वजह से हॉकरों की पहली मांग है—पेशे की मान्यता।

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

आज जब हॉकरों पर नए सिरे से हमले हो रहे हैं, तब भी पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन ने साफ कर दिया है कि—यह लड़ाई सिर्फ रेल हॉकरों की नहीं है; यह तमाम कामकाजी लोगों की आजीविका की लड़ाई है। क्योंकि आज हॉकर प्रभावित हैं, कल आम यात्री, मजदूर और निम्न मध्यम वर्ग के लोग प्रभावित होंगे।

रेलवे के निजीकरण का मतलब सिर्फ मालिकाना हक बदलना नहीं है; इसका मतलब सामाजिक जिम्मेदारी का खात्मा है। कॉर्पोरेट कंपनियां कभी भी सस्ती जनसेवा देने नहीं आतीं; वे मुनाफे के लिए आती हैं। नतीजतन, अगर आने वाले दिनों में रेलवे पूरी तरह से कॉर्पोरेट नियंत्रण में चली जाती है, तो आम जनता को ही नुकसान होगा। टिकटों के दाम बढ़ेंगे, सब्सिडी कम होगी और गरीब लोगों के यात्रा करने का अधिकार सीमित हो जाएगा।

इसलिए आज एक व्यापक एकता की जरूरत है। रेल हॉकर, सड़क के हॉकर, यात्री संगठन, श्रमिक संगठन—सभी को मिलकर इस लड़ाई में उतरना होगा। विकास निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन वह विकास लोगों के खिलाफ नहीं हो सकता। जो विकास लोगों की आजीविका छीन ले, उसे विकास नहीं कहा जा सकता; वह कॉर्पोरेट लूट का दूसरा नाम है।

हम साफ तौर पर कहना चाहते हैं—हॉकर उच्छेद नहीं, पुनर्वास चाहिए। आजीविका के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए। रेलवे को कॉर्पोरेट के हाथों में नहीं सौंपा जा सकता।

पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन (CITU) के नेतृत्व में यह संघर्ष अतीत में भी था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगा। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ कुछ स्टालों को बचाने की लड़ाई नहीं है—यह कामकाजी लोगों की गरिमा, अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई है। आइए, सब मिलकर इस लड़ाई में सड़कों पर उतरें।

(लेखक सी आई टी यू पश्चिम बंगाल के सचिव मंडल की सदस्य हैं)

साभार : दैनिक गणशक्ति (बांग्ला) मई 20,2026

अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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