उन्यासी (79) वर्षों के बाद, एक राष्ट्र के रूप में आज हम सबसे कठिन समय के सामने आ खड़े हुए हैं; आशा का वसंत काल असंतोष के शीतकाल में बदल गया है। जो बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, वह यह है कि "प्रतिज्ञा को पूरा" करके "जीवन और स्वतंत्रता" के मार्ग पर देश को जगाने के लिए "नियति के साथ किए गए वादे" में निहित स्वतंत्रता की वही मौलिक चेतना ही आज प्रश्नों के घेरे में है।
स्वाधीनता
जो चुनौती लगातार तेज होती जा रही है— नीलोत्पल बसु

वह समय स्वतंत्र भारत के लिए सर्वोत्तम, आशा का वसंत काल कहा जा सकता है। तत्कालीन परिस्थितियों की आत्मा के साथ पूर्णतः एकात्म होकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था— "वर्षों पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब समय आ गया है जब हम उस प्रतिज्ञा को पूरा करेंगे... मध्यरात्रि के समय जब पूरी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग उठेगा।"
वह उज्ज्वल समय अब अतीत हो चुका है। उन्यासी (79) वर्षों के बाद, एक राष्ट्र के रूप में आज हम सबसे कठिन समय के सामने आ खड़े हुए हैं; आशा का वसंत काल असंतोष के शीतकाल में बदल गया है। जो बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, वह यह है कि "प्रतिज्ञा को पूरा" करके "जीवन और स्वतंत्रता" के मार्ग पर देश को जगाने के लिए "नियति के साथ किए गए वादे" में निहित स्वतंत्रता की वही मौलिक चेतना ही आज प्रश्नों के घेरे में है।
हमसे कहाँ चूक हुई? यह चेतावनी पहले से ही मौजूद थी। संविधान सभा में संविधान का मसौदा प्रस्तुत करते हुए अपने समापन भाषण में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने चेतावनी भरे स्वर में कहा था कि भारत एक विरोधाभासपूर्ण जीवन में प्रवेश करने जा रहा है। भारत एक ऐसा संविधान अपनाने जा रहा है जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार— एक व्यक्ति, एक वोट और कानून की नजर में सभी के लिए समान नागरिकता के रूप में राजनीतिक लोकतंत्र का वादा करता है। जिस समाज में सामाजिक और आर्थिक समानता पूर्णतः अनुपस्थित थी, उसी पर यह राजनीतिक लोकतंत्र थोपा जाने वाला था; विरोधाभास इसी सत्य में निहित था। असमानता की क्रमिक परतों, अपरिवर्तनीय पेशों, कुछ ही हाथों में धन के संकेंद्रण और जातिगत विशेषताओं के साथ नागरिकता की अवधारणा में नैतिक निषेधों पर आधारित भारतीय सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हुआ था।
इन सभी तनावों को जो शक्ति एक पुल की तरह जोड़कर रख सकती थी, उसे अम्बेडकर ने चिन्हित किया था। उस शर्त के बिना स्वतंत्रता और समानता केवल एक कानूनी कल्पना बनकर रह जातीं। इन दो दुनियाओं के बीच का सेतु भातृत्व था। अम्बेडकर के अनुसार, भातृत्व के बिना स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे को नष्ट कर देतीं। भातत्व की भावना संविधान की प्रस्तावना में कोई स्वाभाविक संयोजन मात्र नहीं थी। संविधान के उद्देश्यमूलक प्रस्ताव में भी इसका उल्लेख नहीं था, और न ही किसी अन्य द्वारा प्रस्तावित वैकल्पिक संविधानों में यह अवधारणा मौजूद थी। इसी कारण उन्होंने इसे प्रस्तावना में शामिल करने पर जोर दिया था। इस संदर्भ में उनकी टिप्पणी थी, "भारत में भ्रातृभाव और सद्भाव की आवश्यकता इससे पहले कभी इतनी अधिक नहीं थी।"
धार्मिक समुदाय को राष्ट्र-का आधार मानने की अवधारणा के संदर्भ में भी उस पीढ़ी के स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान-निर्माताओं ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। वे एक ऐसे स्वतंत्र भारत के पक्ष में खड़े थे जो इस आधार का विरोध करेगी। इसलिए स्वतंत्रता और राजनीतिक संप्रभुता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों के माध्यम से संविधान में स्वतंत्रता संग्राम की चेतना प्रवाहित हुई थी।
यह पहली बार है जब हम देख रहे हैं कि हिंदुत्व की प्रधानता वाली राजनीतिक शक्ति और प्रभावशाली विचारधारा शासन का संचालन कर रही है। आज हम जिस मौलिक संकट का सामना कर रहे हैं, उसका स्रोत इसी वास्तविकता में निहित है। ये न केवल स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहे, बल्कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार का पक्ष भी लिया था। इसलिए, भले ही खुले तौर पर संविधान को त्यागने की घोषणा न की गई हो, लेकिन संविधान के मौलिक आधारों को लगातार खोखला करने की प्रक्रिया उत्साहपूर्वक चल रही है। अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित भातृत्व की अवधारणा के विपरीत, बहुसंख्यकवादी बहिष्कार और आपसी नफरत के अभ्यास को सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन मिला है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा पर आधारित अधिकारों को कार्यपालिका के वर्चस्व की बलिवेदी पर चढ़ाया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों, विशेष रूप से पिछले एक वर्ष के घटनाक्रम को देखने से ही संवैधानिक चेतना का क्षरण स्पष्ट हो जाता है। इससे पहले कभी हमारे देश की राजनीतिक संप्रभुता इस तरह ध्वस्त नहीं हुई थी। मोदी सरकार की प्रेरक शक्ति के रूप में काम कर रहे कॉर्पोरेट गठजोड़ की विदेश नीति ने देश को एक ऐसे खतरनाक अधीनता की ओर धकेल दिया है, जो न केवल संप्रभुता पर चोट करता है बल्कि आम भारतीय लोगों के आर्थिक हितों को भी पूरी तरह तबाह कर देता है। यह प्रवृत्ति ऐसे समय में दिखाई दे रही है जब दुनिया की स्थिति एक बढ़ते बहुध्रुवीकरण की गवाह बन रही है, जहाँ कई राष्ट्र ट्रम्प और अमेरिकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी धमकियों से धीरे-धीरे दूर हट रहे हैं। गाजा और फिलस्तीन में इजरायल द्वारा किए जा रहे जनसंहार में यह बात और भी स्पष्ट होकर सामने आती है। अमेरिकी-इजरायल-ईरान युद्ध ने खाड़ी क्षेत्र को अवर्णनीय रूप से अस्थिर कर दिया है। ईरान, खाड़ी क्षेत्र और यहाँ तक कि रूस से तेल और गैस की आपूर्ति को इस युद्ध ने इस तरह प्रभावित किया है कि आयातित कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर घरेलू खुदरा मूल्यों को बढ़ा रही हैं। इसका प्रभाव दैनिक जीवन में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है। राजनीतिक संप्रभुता के संवैधानिक आधार को मजबूती से स्थापित रखा जाता तो ऐसा कभी न होता। ट्रम्प के आक्रामक टैरिफ-आतंक पर आधारित एकतरफावाद का मुकाबला करने के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है।
एक और मौलिक विषय जो सबसे गंभीर खतरे में है, वह है नागरिकता का प्रश्न। हमने जिस प्रकार एक अत्यंत विविधतापूर्ण जनसंख्या के बीच एकता स्थापित की थी, उसने पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया था। संविधान ने यह सुनिश्चित किया था कि विविध लेकिन अभिन्न और समान नागरिकता के माध्यम से उस विविधता का समाधान होगा। आज हम ठीक इसके विपरीत प्रवृत्ति प्रत्यक्ष देख रहे हैं। वर्तमान में देश की नागरिकता ही एक बहुसंख्यकवादी, आक्रामक बहिष्कारवादी और नफरत से संचालित खतरे का सामना कर रही है। हाल ही में उचित प्रबंधन और पारदर्शिता के बिना शुरू की गई 'विशेष गहन संशोधन' (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया मताधिकार और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की अवधारणा पर कहर ढा रही है। जनगणना, परिसीमन और तथाकथित राष्ट्रीय जनसांख्यिकी अभियानों के माध्यम से वह रणनीति और अधिक प्रभावी बनाई जा रही है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तीव्र करने के साथ-साथ बहुसंख्यकवाद जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र और जनजाति जैसी अन्य विभिन्न पहचानों के बीच के ध्रुवीकरण को भी तीव्र कर देता है। इससे एक ऐसी गहरी अनिश्चितता और भय का माहौल उत्पन्न हो रहा है जो देश की समग्र एकता के लिए चुनौती को और अधिक जटिल बना रहा है।
धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र दोनों अवधारणाएं एक कमजोर स्थिति का सामना कर रही हैं, यह स्पष्ट है। केंद्र और कई राज्य सरकारों पर आरएसएस-भाजपा का अप्रतिरोध्य वर्चस्व और सभी प्रमुख संवैधानिक पदों पर कब्जे का प्रयास संघीय व्यवस्था को समाप्त करने का ही प्रयास है। ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग पहले से कहीं अधिक पक्षपातपूर्ण हो गया है, जिसका प्रयोग विपक्ष को निशाना बनाकर सत्ता पर एकाधिकार सुरक्षित करने में मदद कर रहा है।
'एक देश, एक कर', 'एक देश, एक चुनाव' जैसे नारों का लक्ष्य सभी पर एक समान और कठोर एकरैखिक व्यवस्था थोपना है, जो हमारे गणतांत्रिक लोकतंत्र और 'भारत की अवधारणा' (आईडिया ऑफ इंडिया) की मूल प्रकृति के खिलाफ जाता है। मुख्यधारा की मीडिया पर कॉर्पोरेट स्वामित्व ने मीडिया को एक चाटुकार व्यवस्था में बदल दिया है, जिसे अधिक सटीक रूप से वर्णित करने के लिए आजकल एक अन्य व्यापक प्रचलित शब्द का उपयोग किया जाता है। अपार वित्तीय संसाधनों के बल पर भाजपा को सोशल मीडिया को अपने हथियार के रूप में उपयोग करने का अवसर मिला है। मुख्य रूप से फर्जी मीडिया स्रोतों के माध्यम से वे वास्तविकता को उलटकर सभी समाचारों को उत्तर-सत्य (पोस्ट-ट्रुथ) आधारित विमर्श की ओर धकेलना चाहते हैं। इस काम की पसंदीदा रणनीति लाखों व्हाट्सएप ग्रुप बनाना और झूठा इतिहास व छद्म वैज्ञानिक बातें फैलाना है। असहमत लोगों को डराना, अपमानित करना और ट्रोल करना ही इसका लक्ष्य है। इसके परिणामस्वरूप आतंक का माहौल और गहरा होता जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ सहित न्यायपालिका की स्वतंत्रता के संदर्भ में भयानक क्षरण का उल्लेख किए बिना वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन पूरा नहीं होगा। यह प्रवृत्ति अब स्पष्ट रूप से एक ऐसी कार्यपालिका के प्रति निष्ठावान न्यायपालिका की ओर इशारा करती है, जो अपनी संवैधानिक भूमिका के साथ ही विश्वासघात करती है। अयोध्या फैसले से लेकर धारा 370 को निरस्त करने तक, संविधान की चेतना के प्रति प्रतिबद्धता के बजाय हिंदुत्ववादी अवधारणा के सामने नतमस्तक होने के स्पष्ट संकेत दिखाई देंगे और न्यायपालिका का यह पतन अत्यंत गंभीर भी है। अब दलीय निष्ठा मानकर चुनाव आयोग के कार्यों को स्थगित रखना या मताधिकार जैसे संवैधानिक अधिकारों को रद्द करने की निगरानी के संदर्भ में पूरी तरह से जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेना देश के चुनावी लोकतंत्र की मूल प्रकृति के लिए ही खतरा पैदा करता है।
उच्चतम स्तर की असमानता और उसके साथ तालमेल बिठाती बढ़ती बेरोजगारी की स्थिति ने सांप्रदायिक-कॉर्पोरेट गठजोड़ वाली शासन व्यवस्था के लक्ष्यों और उद्देश्यों को एक बड़े बदलाव के माध्यम से और अधिक स्पष्ट कर दिया है। जो बात लगातार तीखी होती जा रही है, वह है एक ऐसी शासन व्यवस्था जो एक के बाद एक घटनाओं में अपने दाँत और नाखून निकालकर नव-फासीवादी विशेषताओं को ही रेखांकित कर रही है।
इसके बावजूद, असंतोष के इस शीतकाल में, क्या संवैधानिक गणतंत्र के प्रति हमारे लिए निराश या निराशावादी होने का समय आ गया है? ऐसा कुछ होने के बजाय, कुछ ऐसे स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं जिनसे यह महसूस किया जा सकता है कि जनता की चेतना न केवल बनी हुई है बल्कि वह पुनर्जीवित और पुनरुद्दीप्त हो रही है। युवा, जेन-जी पीढ़ी का अभूतपूर्व विद्रोह भड़क उठा है। यह केवल एक नियंत्रणकारी सरकार के कब्जे वाले शिक्षा क्षेत्र में चल रही केंद्रीकरण प्रक्रिया और अन्याय के खिलाफ लड़ाई का सवाल नहीं है। इस लड़ाई ने हजार सूर्यों की चमक के साथ भय के पहाड़ की बर्फ पिघलने के पर्याप्त संकेत दिए हैं; यह सामूहिक साहस और एकता का एक उदाहरण था।
आँसू गैस के गोले, कांटेदार लाठियाँ, पेलेट गन और यहाँ तक कि ए.के.-47 राइफलों का इस्तेमाल करके सरकार ने अपनी हिंसक प्रतिक्रिया दिखाई है। मानो किसी युद्ध का दृश्य हो, जैसा कि आमतौर पर आतंकवादियों के खिलाफ पूर्ण युद्ध के दौरान होता है। इस विरोध प्रदर्शन की ओर से पेश किए गए शक्तिशाली साक्ष्यों ने सरकारी आख्यान को ध्वस्त कर दिया और विरोध के पूरी तरह से शांतिपूर्ण स्वरूप को मजबूती से स्थापित किया। यह पहली बार था जब निगरानी राज्य (सर्वेलांस स्टेट) का पूरा डिजिटल शस्त्रागार सामने दिखाई दिया। लेकिन आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। जनता के दबाव में मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
लेकिन इस आंदोलन का प्रभाव इन सबसे कहीं अधिक गहरा है। प्रदर्शनकारी युवाओं को समझाना तो दूर, सरकार उनके साथ संवाद करने में ही विफल रही। व्हाट्सएप के माध्यम से बाँटा गया 'ज्ञान' और एकतरफा झूठ युवाओं की रचनात्मक इंस्टाग्राम-आधारित प्रतिक्रियाओं का मुकाबला नहीं कर सका। लेकिन जो बात और भी महत्वपूर्ण है वह यह है कि लोगों का मिजाज बदल रहा है। आखिरकार, मोदी की ओर से पेश की गई एक देर रात की रील और ट्वीट में थकान की छाप ही स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
(लेखक CPIM के पोलिटब्यूरो सदस्य और पूर्व सांसद हैं)
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साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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