सरकार में मौजूद बीजेपी पार्टी के पीछे आरएसएस है। वे अपने हर तरह के एजेंडे को बंगाल के लोगों के बीच फैलाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। इस समय राज्य की राजनीतिक स्थिति उनके इस काम के लिए अनुकूल माहौल बना चुकी है। ध्यान रखना होगा कि आरएसएस केवल सांप्रदायिक राजनीति ही नहीं करता या 'हिंदुत्व' की विचारधारा का प्रचार ही नहीं करता, बल्कि अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थक और भारत की बड़ी पूंजी का अभिन्न मित्र रहा है।
हमारे राज्य में बीजेपी की सरकार बनी है। एक तरफ भूतपूर्व तृणमूल कांग्रेस संचालित सरकार के व्यापक भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ लोगों का गुस्सा और दूसरी तरफ धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए बीजेपी राज्य के लोगों के चुनावी समर्थन को अपने पक्ष में जुटाने में सफल रही है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनना महज एक सरकार का बदलना भर नहीं है, यदि बीजेपी की परियोजना का विरोध नहीं किया गया तो बंगाल के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
बीजेपी पार्टी को लेकर हमारी पार्टी की समझ यह है:
बीजेपी कोई साधारण पूंजीवादी (बुर्जुआ) पार्टी नहीं है क्योंकि फासीवादी शैली का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इसे संचालित और नियंत्रित करता है। बीजेपी के सत्ता में आने से आरएसएस को राज्य की सत्ता और सरकारी तंत्र के विभिन्न अंगों में प्रवेश का अवसर मिल रहा है। हिंदुत्व की विचारधारा, भारत की मिश्रित संस्कृति को खारिज करते हुए हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लक्ष्य से पुनरुत्थानवाद को बढ़ावा देती है। हिंदुत्व की विचारधारा सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती है और परिणामस्वरूप अल्पसंख्यक कट्टरवाद के विकास में भी मदद करती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष नींव पर इसके गंभीर दुष्परिणाम होते हैं और यह वामपंथी व लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए एक गंभीर खतरा है। इसके साथ ही बड़े व्यापार और जमींदारों का एक बड़ा हिस्सा तथा अमेरिका के नेतृत्व वाला साम्राज्यवाद बीजेपी को पूर्ण समर्थन दे रहा है।
सरकार में मौजूद बीजेपी पार्टी के पीछे आरएसएस है। वे अपने हर तरह के एजेंडे को बंगाल के लोगों के बीच फैलाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। इस समय राज्य की राजनीतिक स्थिति उनके इस काम के लिए अनुकूल माहौल बना चुकी है। ध्यान रखना होगा कि आरएसएस केवल सांप्रदायिक राजनीति ही नहीं करता या 'हिंदुत्व' की विचारधारा का प्रचार ही नहीं करता, बल्कि अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थक और भारत की बड़ी पूंजी का अभिन्न मित्र रहा है। इसीलिए हमने अपनी पार्टी कांग्रेस के दस्तावेज में कहा है कि बीजेपी चालित सरकार कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ पर टिकी हुई है, और उनकी सरकार की नीतियां इसी 'गठजोड़' द्वारा तय होती हैं।
हमारे राज्य के मामले में भी नई सरकार की नीतियां इस समझ से बाहर नहीं जाएंगी। नतीजतन, एक तरफ 'कॉर्पोरेट-उन्मुख विकास' के मॉडल को लागू करने की कोशिश की जाएगी। सरकार बनते ही हॉकरों के हटाने के जरिए इसके लक्षण दिखाई दे रहे हैं। हाकरों की बेदखली के पीछे भारतीय रेलवे को कॉर्पोरेट संस्थाओं के हाथों में सौंपने का मकसद छुपा है, जो बिल्कुल स्पष्ट है। क्योंकि रेल विभाग अपनी जमीन से हॉकरों और अन्य तथाकथित 'अवैध' कब्जों को हटाकर रेल सेवाओं में वास्तव में क्या सुधार करना चाहता है, इसकी कोई दिशा वे नहीं दिखा पाए हैं। बल्कि 'अमृत भारत स्टेशन योजना' के नाम पर रेलवे स्टेशनों को नए सिरे से सजाने का ठेका कॉर्पोरेट संस्थाओं को दिया गया है। अब तक 1300 से अधिक स्टेशनों का ठेका विभिन्न कॉर्पोरेट कंपनियों को मिल चुका है, जिनमें हमारे राज्य के लगभग 80 स्टेशन शामिल हैं। साफ जाहिर है कि 'डबल इंजन' सरकार रेलवे के कॉर्पोरेटाइजेशन (निजीकरण) के काम में तेजी लाने के लिए तत्पर है। इसके परिणामस्वरूप कई लाख गरीब हॉकरों के पेट पर लात पड़ेगी।
बीजेपी भले ही जुबानी तौर पर स्वदेशी की बात करती हो, लेकिन नीतिगत रूप से वह साम्राज्यवाद-उन्मुख नए उदारवादी अर्थशास्त्र की सबसे उग्र पैरोकार है। जिसके कारण शिक्षा के निजीकरण से लेकर देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेचने के मामले में वह सबसे आगे है। निजीकरण या सभी सेवाओं और बुनियादी ढांचों को पूँजीपतियों के हाथों में सौंपने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग भ्रष्टाचार है। राफेल सौदे से लेकर हालिया नीट प्रश्नपत्र लीक की घटना यह साबित करती है कि बीजेपी नीत सरकार किसी भी हाल में भ्रष्टाचार मुक्त सरकार नहीं हो सकती। यहाँ तक कि सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास के सवाल पर भी नीतिगत रूप से बीजेपी सरकार निजीकरण और कॉर्पोरेट-उन्मुख नीतियों पर ही चलेगी। जिसके कारण सरकारी बुनियादी ढांचे और सुविधाओं से और अधिक संख्या में लोग, विशेष रूप से श्रमजीवी और गरीब लोग, बेदखल हो जाएंगे।
हमारे राज्य में इस समय सबसे बड़ी समस्या रोजगार का संकट है।
चुनाव के बाद बंगाल, हमारा कर्तव्य
पिछले कुछ वर्षों में हमारे राज्य में प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ी है। सरकारी खाली पदों पर भर्तियां नहीं हो रही हैं। राज्य सरकार के विभागों से लेकर निगमों और नगरपालिकाओं में भारी संख्या में पद खाली पड़े हैं। कृषि से आय घट रही है। गाँव के लोग लगातार कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं गाँव के गरीब लोगों को 20-25 प्रतिशत तक की ब्याज दर पर कर्ज दे रही हैं। जुल्म और जबरन वसूली बढ़ेगी। ग्रामीण बाजारों में गिग-आधारित अस्थाई काम बढ़ रहे हैं। हमारे राज्य में एक व्यक्ति औसतन जीवन जीने के लिए प्रति माह मात्र 3,239/-रुपये खर्च करता है। ऐसी आर्थिक स्थिति में सबसे ज्यादा पीड़ित हमारे राज्य के गरीब मजदूर वर्ग के लोग हैं। इस समय चाय बागानों से लेकर रेलवे हॉकरों तक, प्रवासी मजदूरों से लेकर आलू किसानों तक इस राज्य के गरीब श्रमजीवी लोगों (ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में) को आंदोलन और संघर्ष के मैदान में उतारना और उनकी लड़ाई का नेतृत्व करना पार्टी का मुख्य कार्य है।
इसके साथ ही यह भी याद रखना होगा कि आरएसएस द्वारा संचालित बीजेपी सरकार अपने सांप्रदायिक एजेंडे को पूरी तरह से लागू करेगी। इतिहास को विकृत करने, खासकर बंगाल के इतिहास को बदलने के काम में वे हाथ डालेंगे ही। अभी से ही पाठ्यक्रम बदलने की बातें की जा रही हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक क्षेत्र में भी बंगाल की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को दरकिनार कर नफरत की राजनीति का माहौल बनाया जाएगा। याद रखना होगा कि हमारे राज्य में आरएसएस धार्मिक ध्रुवीकरण के मामले में काफी हद तक सफल रहा है, इसीलिए बीजेपी इस चुनाव में ऐसा परिणाम हासिल कर सकी है। इसलिए बंगाल के सामाजिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष सोच को बचाए रखना और प्रगतिशील चेतना का विस्तार करने का संघर्ष आगे बढ़ाना हमारे लिए एक अत्यंत आवश्यक कार्य है। हमने पिछली पार्टी कांग्रेस में ही कहा था कि इस काम के लिए सभी प्रकार के बौद्धिक संसाधनों को जुटाना होगा। हमें न केवल केंद्रीय स्तर पर, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी सभी प्रगतिशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों, संस्थाओं, क्लबों आदि को इस वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट करना होगा।
बीजेपी सरकार और आरएसएस के विस्तार के खिलाफ लड़ाई के लिए पार्टी को तैयार होना होगा। याद रखना होगा कि पश्चिम बंगाल में इस तरह की लड़ाई का हमारा कोई पूर्व अनुभव नहीं है। देश विभाजन के समय बंगाल का विभाजन तो हुआ, लेकिन आजादी के बाद के दौर में बंगाल की राजनीति और समाज में हमारी पार्टी और प्रगतिशील धारा के प्रभाव के कारण सांप्रदायिक राजनीति मुख्य भूमिका में नहीं आ सकी। लेकिन आज बीजेपी की ताकत बढ़ने और सरकार बनने के कारण 'विभाजन की राजनीति' को पुनर्जीवित करने का प्रयास चल रहा है। इस राजनीति के माध्यम से श्रमजीवी लोगों को बाँटा जा रहा है।
हमें यह याद रखना होगा कि केवल हिंदू-मुस्लिम ही नहीं, आरएसएस जातिवाद के मुद्दे पर भी अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगा। पूरे देश का अनुभव रहा है कि दलितों और आदिवासियों का 'हिंदूकरण' करके उन्हें आरएसएस की सांप्रदायिक राजनीति के प्रभाव में लाया जाता है। हमारे राज्य में आरएसएस ने इस दिशा में पहले ही काफी प्रगति कर ली है। गरीब, दलित और आदिवासी इलाकों में स्कूल खोलने से लेकर चैरिटी अस्पताल/चिकित्सा जैसी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से वे यह काम कर रहे हैं। इसलिए सामाजिक क्षेत्र में भी इन सभी मामलों में हमारे सक्रिय और प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
हमें अपने संगठन का तेजी से इस प्रकार निर्माण करना होगा ताकि हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल साफ रहे। इसके लिए पार्टी के भीतर वैचारिक और राजनीतिक समझ को पारदर्शी बनाना होगा। जब तक हम पार्टी में वैचारिक स्तर को ऊँचा उठाने का काम मजबूत नहीं करेंगे, तब तक हम इस लड़ाई के योग्य कैडर तैयार नहीं कर पाएंगे।
हमें जनता के बीच दृश्यमान होना होगा। दृश्यमान होने का मतलब सिर्फ सड़कों पर झंडे लगाना नहीं है। आम लोगों के दैनिक जीवन में, विशेषकर गरीब मजदूरों और किसानों की हर लड़ाई व रोजमर्रा के जीवन-संघर्ष में हमारी पार्टी और पार्टी के कैडर उनके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं या नहीं, असली सवाल यही है। जनता के बीच जाकर उनकी विशिष्ट समस्याओं के समाधान के लिए हम कितने ईमानदार हैं, लोग यही देखना चाहते हैं। इस कार्य में सफलता से अधिक हमारी ईमानदारी और समर्पण महत्वपूर्ण है।
आरएसएस अपने विभिन्न संगठनों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने का काम करता है। वे ऐसे कई संगठन और संस्थाएं चलाते हैं जिन्हें सीधे तौर पर आरएसएस चालित संगठन के रूप में पहचाना भी नहीं जा सकता। कई मामलों में वे एक गुप्त, भूमिगत नेटवर्क की तरह काम करते हैं। इसलिए सभी क्षेत्रों में सतर्क निगरानी की आवश्यकता है। इस मामले में ध्यान रहे कि यदि हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं होगा, तो हम यह समझ ही नहीं पाएंगे कि असली आरएसएस का काम कौन सा है। साथ ही जनता के साथ गहरे जुड़ाव के बिना इस तरह की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिल पाएगी। इसलिए हमारे पार्टी कैडरों को तेजी से इस काम में कुशल होना पड़ेगा।
बंगाल की राजनीति और समाज एक फासीवादी राजनीतिक ताकत से प्रभावित होकर पीछे की ओर जाएगा या आगे बढ़ेगा, इस सवाल का फैसला काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि बंगाल में वामपंथ फिर से अपना सिर उठाकर खड़ा हो पाता है या नहीं। और वामपंथी, प्रगतिशील तथा लोकतांत्रिक राजनीति के पुनरुत्थान के लिए ही हमारी पार्टी को एक मजबूत जन-आधार पर खड़ा करना इस समय का सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी कर्तव्य है।
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[लेखक सी पी आई ( एम) के पोलिट ब्यूरो सदस्य पश्चिम बंगाल के सचिव हैं]
साभार:- मार्क्सवादी पथ
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