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नए रूप में कृषि संकट: अब खेतिहर मजदूर ही कर रहे अधिक आत्महत्याएं

राजीव कुमार पाण्डेय29 जून 20263 मिनट पठन17 बार पढ़ा गया

के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है।

नए रूप में कृषि संकट: अब खेतिहर मजदूर ही कर रहे अधिक आत्महत्याएं

पहले किसान आत्महत्याएं ही चर्चा का केंद्र बिंदु थीं, लेकिन अब किसानों की तुलना में खेतिहर मजदूर अधिक आत्महत्याएं कर रहे हैं। लंबे समय से जमीन का टुकड़ों में बंटना, खेती में मुनाफा कम होना, कर्ज का बोझ, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और वैकल्पिक रोजगार की कमी—इन सभी कारणों से छोटे और सीमांत किसान धीरे-धीरे खेतिहर मजदूरों में तब्दील हो रहे हैं। यही आर्थिक अनिश्चितता उनमें से कई लोगों को आत्महत्या की ओर धकेल रही है।

महाराष्ट्र के वाशिम जिले के पांगरी नवघरे गांव के 40 वर्षीय राजू कालापाडे की मौत इस संकट का एक क्रूर प्रतीक है। महज दो एकड़ जमीन के मालिक राजू, खेती के साथ-साथ दूसरों के खेतों में मजदूरी का काम भी करते थे। बड़ी बेटी की शादी का खर्च उठाने के लिए उन्होंने स्थानीय साहूकारों से कर्ज मांगा, लेकिन उन्हें नहीं मिला। शादी के दिन ही उन्होंने आत्महत्या कर ली। बाद में गांव के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर बेटी की शादी कराई।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है। साल 2021 से पहली बार किसानों की तुलना में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की संख्या अधिक हो गई, और तब से यह प्रवृत्ति लगातार जारी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, 'किसान' और 'खेतिहर मजदूर' के बीच का अंतर धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का बंटवारा होने और उसके छोटे होने के कारण, कई परिवारों की जमीन अब आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है। नतीजतन, उन्हें अपनी जमीन पर खेती करने के साथ-साथ दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम करना पड़ रहा है।

किसान नेता राजू शेट्टी के मुताबिक, उत्पादन लागत लगातार बढ़ने के बावजूद फसलों के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसल में प्रति एकड़ लगभग 20 हजार रुपये का खर्च आने के बावजूद, बाजार भाव लंबे समय से 4,500 से 4,600 रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही बना हुआ है। इसके कारण कर्ज बढ़ रहा है, किसान साहूकारों के चक्कर काटने को मजबूर हो रहे हैं और अंततः कई लोग आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं।

विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है। सिंचाई की कमी, अनियमित बारिश, ओलावृष्टि, सूखा और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने खेती को और भी अनिश्चित बना दिया है। सीमित जमीन के मालिक किसान मजबूर होकर खेतिहर मजदूरों में बदल रहे हैं, लेकिन वह मजदूरी भी परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

किसान संगठनों का दावा है कि ऋण मिलने में भेदभाव, उत्पादन लागत में वृद्धि, सरकारी सहायता की कमी और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव—इन सबने मिलकर कृषि अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। उनके अनुसार, जब तक ढांचागत समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की यह प्रवृत्ति कम नहीं होगी।

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साभार: गणशक्ति

अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय

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