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फ्रांस 4, नॉर्वे 1- क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं,बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है :- शमीक लाहिड़ी

राजीव कुमार पाण्डेय27 जून 20265 मिनट पठन17 बार पढ़ा गया

नॉर्वे एक ऐसा देश है, जहाँ फियर्ड का पानी आसमान का रंग ले लेता है। जहाँ वाइकिंग की कहानियाँ आज भी हवाओं में तैरती हैं। और फ्रांस — एक ऐसा देश, जिसने कई बार सिखाया है कि क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है।

फ्रांस 4, नॉर्वे 1- क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं,बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है :- शमीक लाहिड़ी

स्कोरलाइन कहती है कि यह एकतरफा मैच था। लेकिन फुटबॉल केवल स्कोर का इतिहास नहीं है। यह मनुष्य के सपनों का भी इतिहास है। और उस इतिहास में यह मैच एक ऐसी शाम को था, जिस दिन उत्तर यूरोप की बर्फ फ्रांसीसी रोशनी की तीव्रता में पिघल गई।

नॉर्वे एक ऐसा देश है, जहाँ फियर्ड का पानी आसमान का रंग ले लेता है। जहाँ वाइकिंग की कहानियाँ आज भी हवाओं में तैरती हैं। और फ्रांस — एक ऐसा देश, जिसने कई बार सिखाया है कि क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है।

ये दो दुनियाएँ आमने-सामने थीं। लेकिन उस दिन घास पर एक और इंसान खड़ा था।

उस्मान देम्बेले। एक समय था जब उन्हें 'बर्बाद हुई प्रतिभा' कहा जाता था। जिनकी शारीरिक चोटों ने बार-बार उनकी प्रतिभा के साथ विश्वासघात किया। जिस इंसान को लेकर दुनिया जितनी बार हैरान हुई, उससे कहीं ज्यादा निराश हुई। उसी इंसान ने महज पच्चीस मिनट में हैट्रिक लगाकर याद दिला दिया — प्रतिभा कभी मरती नहीं; वह बस अपने मौसम का इंतजार करती है।

फुटबॉल कभी-कभी एक ऐसे इंसान को चुनता है, जिसके पैरों के जरिए वह अपनी अनकही पीड़ा को अभिव्यक्त करना चाहता है। इस शाम उस भाषा का नाम देम्बेले था।

फ्रांस के फुटबॉल को कई लोग ताकत का फुटबॉल कहते हैं। लेकिन इस टीम की सबसे बड़ी ताकत मांसपेशियां नहीं, बल्कि जगह बनाने की कला है। वे गेंद लेकर दौड़ते नहीं हैं, वे प्रतिद्वंद्वी के सोचने से पहले ही वहाँ पहुँच जाते हैं। दिदिए देशँर की टीम ने केवल आक्रमण ही नहीं किया; उन्होंने नॉर्वे के डिफेंस से सवाल किए। एक बार दाईं ओर से, एक बार बीच से, और फिर अचानक एम्बाप्पे का गहराई में उतरकर सामने की ओर थ्रू-पास बढ़ाना — हर आक्रमण मानो एक ही नदी की अलग-अलग धाराएँ थीं। नॉर्वे कुछ समझ पाता, उससे पहले ही देम्बेले ने तीन बार जाल ढूँढ लिया।

फिर भी, नॉर्वे सिर्फ हारने वालों की कहानी नहीं है। थेलो आसगार्ड का वह गोल मानो बर्फ के बीच से निकलकर आई हरी घास का एक टुकड़ा था। क्षणभंगुर, लेकिन बेहद खूबसूरत। एक पल के लिए लगा था कि मैच में शायद एक और कहानी जन्म लेगी। लेकिन फुटबॉल की 'इच्छा' उस दिन कोई और कविता लिख रही थी।

दूसरे हाफ में नॉर्वे को एक पेनल्टी मिली। अगर गोल हो जाता तो फासला कम हो जाता और मैच का मिजाज भी शायदा थोड़ा बदल जाता। लेकिन फ्रांसीसी गोलकीपर के हाथ ने सिर्फ एक शॉट नहीं रोका; उसने इस संभावना को भी रोक दिया। कई बार एक 'सेव' भी एक गोल जितना ही कीमती हो जाता है।

मैच के आखिरी पलों में देसिरे दुए का गोल एक तरह का हस्ताक्षर था। जैसे किसी चित्रकार ने पेंटिंग के नीचे अपना नाम लिख दिया हो। 4-1। खेल खत्म।

लेकिन इस मैच की सबसे बड़ी सीख नतीजे में नहीं है। फ्रांस ने दिखा दिया कि एक बड़ी टीम होने का मतलब सिर्फ बड़े सितारों का जमावड़ा होना नहीं है। बड़ी टीम होने का मतलब एक ऐसी व्यवस्था है, जहाँ एम्बाप्पे गोल न करके भी मैच के नायक बन सकते हैं, क्योंकि वह दूसरों को नायक बना सकते हैं। जहाँ एक देम्बेले हैट्रिक बनाते हैं, और दूसरे दुए आखिरी फिनिशिंग टच देते हैं। वहाँ व्यक्ति से बढ़कर समष्टि (पूरी टीम) बड़ी हो जाती है।

नॉर्वे के लिए भी यह हार कोई अपमान नहीं, बल्कि एक सबक है। क्योंकि वे पहले ही अंतिम 32 में अपनी जगह पक्की कर चुके हैं। लेकिन इस मैच ने उन्हें याद दिला दिया कि नॉकआउट चरण में सिर्फ जज्बा काफी नहीं होता। यूरोप के 'फुटबॉल अभिजात्य' को हराने के लिए साहस के साथ-साथ अनुशासन की भी जरूरत होती है।

फुटबॉल दुनिया का एक छोटा संस्करण है। उस दुनिया में कोई साम्राज्य बनाता है, तो कोई विद्रोह करता है। उस दिन फ्रांस एक साम्राज्य की तरह खेला। लेकिन फुटबॉल की खूबसूरती यही है — साम्राज्य भी जानता है कि अगले ही मैच में उसे फिर से अपने अस्तित्व को साबित करना होगा। क्योंकि विश्व कप के इतिहास में कोई भी ताज स्थायी नहीं है। स्थायी हैं तो सिर्फ वे पल, जब एक गेंद इंसान के पैरों में जाकर कविता बन जाती है।

और एक महत्वपूर्ण बात – जरा एक बार फ्रांस के खिलाड़ियों की ओर देखिए। इस फ्रांसीसी टीम को देखने पर इतिहास का एक और अध्याय नजर आता है। एक ऐसी कहानी, जो स्कोरबोर्ड पर नहीं लिखी होती। इस एकादश के कई फुटबॉलरों की पारिवारिक जड़ें अफ्रीका की मिट्टी में हैं — सेनेगल, कैमरून, कांगो, अल्जीरिया, माली, अंगोला या गिनी। इसके बावजूद, जब वे फ्रांस की नीली जर्सी पहनकर जीत का जश्न मनाते हैं, तब वे केवल एक देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे होते; वे इतिहास का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। वह इतिहास, जहाँ उपनिवेशवाद एक दिन इंसानों को जहाजों में भरकर अफ्रीका से यूरोप में गुलाम बनाकर लाया था; आज उन्हीं लोगों के वंशज दुनिया के सबसे बड़े मंच पर यूरोप को एक नया चेहरा दे रहे हैं।

आज के यूरोप में जब सीमाएँ ऊँची करने की बात की जाती है, जब प्रवासियों को डर का दूसरा नाम बना दिया जाता है, जब दक्षिणपंथी 'शुद्ध नस्ल के सिद्धांत' की कहानी गढ़ते हैं, तब फ्रांस की यह टीम खामोशी से एक दूसरा सच बयां करती है।

फुटबॉल खून की शुद्धता नहीं जानता; वह सिर्फ पैरों की भाषा जानता है।

गोल होने से पहले गेंद कभी पासपोर्ट देखना नहीं चाहती।

झंडा कभी-कभी इंसानों को बाँट देता है, लेकिन फुटबॉल इंसानों को एक साथ दौड़ना सिखाती है। फ्रांस की नीली जर्सी में उस दिन अफ्रीका की कई नदियाँ आकर मिल गई थीं। भूमध्य सागर अब कोई सीमा नहीं था; वह सिर्फ दो महाद्वीपों के बीच बिछा हुआ हरे मैदान का एक टुकड़ा था। और उस मैदान पर देम्बेले की हैट्रिक सिर्फ तीन गोल नहीं थे — वे उन लोगों के लिए तीन खामोश जवाब थे, जो आज भी मानते हैं कि इंसान की पहचान उसके जन्म से होती है, उसकी सम्भावनाओं से नहीं।

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(लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद,'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)

अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय

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