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द ग्रेट बिट्रेयल ऑफ बंगाल: जब 'खेला' खेलने वालों के साथ ही हो गया महा-'खेला'- केशव भट्टड़

केशव कुमार भट्टड़23 जून 20266 मिनट पठन117 बार पढ़ा गया

बंगाल की राजनीति गंभीर विमर्श का विषय है, मनोरंजन का नहीं। शुक्र है कि राज्य में 'लेफ्ट' है, कोने-कोने में है और पूरे लय में है। तपे -तपाए जमीन से जुड़े वाम नेता हैं। प्रगतिशील युवा और संगठित टीम हैं। बंगाल की जन-चेतना के लिए 'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' ही अंतिम बात है। और यह देश के लिए भी सच है।
पिछले 15 सालों तक बंगाल की राजनीति की बेताज बादशाह रहीं ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लिए यह समय
"माया मिली न राम" जैसा है। भाजपा के साथ बाइनरी सेटिंग की राजनीति में झूला झूलते हुए जिस भतीजे (भाइपो) को दीदी ने पूरी पार्टी सौंपने की कसम खाई थी, आज वही अभिषेक बनर्जी पार्टी से 'सस्पेंड' कर दिए गए हैं और ममता दीदी को अध्यक्ष पद से ही 'मुक्त' कर दिया गया है। ऑफर है मार्गदर्शक बनने का। उफ्फ़। याद आया- अँखियों से लौह-नीर पिघलाते लौह-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, वफ़ा जिनसे की, बेवफा हो गए.. विधायकों के कथित जाली हस्ताक्षरों के विवाद ने ऐसा मोड़ लिया कि कालीघाट के किले में अब केवल सन्नाटा और गिने-चुने वफादार बचे हैं। कल तक हुँकार भरने वाली दीदी अब कल्याण बाबू के सहारे कोर्ट-कचहरी के चक्कर और तारीख पर तारीख। राजनीति का यह कैसा दौर आया है, जहां 'खेला होबे' का नारा देने वालों के साथ ही 'महा-खेला' हो गया!

'द ग्रेट बिट्रेयल ऑफ बंगाल':

जब 'खेला' खेलने वालों के साथ ही हो गया महा-'खेला'

- केशव भट्टड़


श्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से रसगुल्ले जैसी मीठी नहीं, बल्कि लंका मिर्च जैसी तीखी रही है। लेकिन हाल ही में न्यू टाउन के एक आलीशान होटल से जो 'द ग्रेट बिट्रेयल ऑफ बंगाल' नाम का लाइव कॉमेडी शो प्रसारित हुआ है, उसने बांग्ला थिएटर के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। खबरों के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मंच पर एक ऐसा ऐतिहासिक और हास्यास्पद तख्तापलट हुआ है, जिसकी कल्पना खुद स्क्रिप्ट लिखने वाले भी नहीं कर पाए थे।

पर्दा उठता है और हम देखते हैं कि कल तक जो नेता 'दीदी' के आंचल की छांव में 'भाइपो' की जय-जयकार करते नहीं थकते थे, उन्होंने ही रात के अंधेरे में एक ऐसी 'असली तृणमूल' खड़ी कर दी, जिसने खुद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को पार्टी से 'गेट आउट' का टिकट थमा दिया! इस राजनीतिक प्रहसन के मुख्य किरदारों और उनके वर्तमान हालातों पर एक नजर :


1. ऋतब्रत बनर्जी (उर्फ नए 'रिंगमास्टर')
इस पूरे कॉमेडी शो के मुख्य सूत्रधार और डायरेक्टर बनकर उभरे हैं ऋतब्रत बनर्जी (उलबेड़िया पूर्व के विधायक)। कल तक जिन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निकाला गया था, उन्होंने "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" की कहावत को चरितार्थ करते हुए पूरी की पूरी पार्टी पर ही अपना दावा ठोक दिया। 60 विधायकों और 70 पार्षदों को होटल में जुटाकर ऋतब्रत ने खुद को 'असली तृणमूल' का भाग्यविधाता घोषित कर दिया। कल तक जो कालीघाट के चक्कर काटते थे, आज वही ऋतब्रत चुनाव आयोग को नया संविधान और नई कमेटी सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। इनके चेहरे की मुस्कान बता रही है कि 'दीदी' को उन्हीं के खेल में मात देने का मजा ही कुछ और है।

2 . ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी (सिंहासन विहीन सुल्तान)
पिछले 15 सालों तक बंगाल की राजनीति की बेताज बादशाह रहीं ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लिए यह समय "माया मिली न राम" जैसा है। भाजपा के साथ बाइनरी सेटिंग की राजनीति में झूला झूलते हुए जिस भतीजे (भाइपो) को दीदी ने पूरी पार्टी सौंपने की कसम खाई थी, आज वही अभिषेक बनर्जी पार्टी से 'सस्पेंड' कर दिए गए हैं और ममता दीदी को अध्यक्ष पद से ही 'मुक्त' कर दिया गया है। ऑफर है मार्गदर्शक बनने का। उफ्फ़। याद आया- अँखियों से लौह-नीर पिघलाते लौह-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, वफ़ा जिनसे की, बेवफा हो गए..। विधायकों के कथित जाली हस्ताक्षरों के विवाद ने ऐसा मोड़ लिया कि कालीघाट के किले में अब केवल सन्नाटा और गिने-चुने वफादार बचे हैं। कल तक हुँकार भरने वाली दीदी अब कल्याण बाबू के सहारे कोर्ट-कचहरी के चक्कर और तारीख पर तारीख। राजनीति का यह कैसा दौर आया है, जहां 'खेला होबे' का नारा देने वालों के साथ ही 'महा-खेला' हो गया!

3 . 'पलट गए वफादार'
इस शो के सबसे मनोरंजक किरदार वे वरिष्ठ नेता हैं जो कभी ममता दीदी के सबसे करीबी - 'हनुमान' - माने जाते थे। हावड़ा मध्य के विधायक अरूप रॉय अब पार्टी के नए चेयरमैन बन बैठे हैं—यानी ममता दीदी की कुर्सी पर अब उनका कब्जा है। वहीं फिरहाद (बॉबी) हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष और सबीना यास्मिन जैसे दिग्गज, जो कल तक दीदी के लिए जान देने की बातें करते थे, पाला बदलकर ऋतब्रत के खेमे में नए 'उपाध्यक्ष' की कुर्सियां संभाल रहे हैं। अरूप बिस्वास तो चुनाव हारने के बाद भी इस नई कमेटी में मलाईदार पद पा गए। इन नेताओं का वर्तमान देखकर गिरगिट भी शरमा जाए कि रंग बदलने की ऐसी करामाती कला उनके खानदान में किसी ने नहीं सीखी!

4. अन्य विधायक और 'टैक्स पेयर' जनता का हाल
इस महा-कॉमेडी में बंगाल के विधायकों का हाल भी देखने लायक है। सुबह एक गुट में नाम आता है, दोपहर को वे दूसरे गुट में चले जाते हैं, और शाम को इस्तीफा सौंप देते हैं। विधानसभा अब दो हिस्सों में बंट चुकी है—'ऋतब्रत' बनाम 'कालीघाट'। कूणाल घोष और मदन मित्रा जैसे बयानवीर नेता अब अलग कोनों में बैठकर अपनी खोई हुई प्रासंगिकता ढूंढ रहे हैं।

'द ग्रेट बिट्रेयल ऑफ बंगाल' का यह पहला सीजन अभी समाप्त नहीं हुआ है। इन नेताओं को चुनाव आयोग और कलकत्ता हाईकोर्ट के चक्कर काटते देखकर जनता बस यही सोचती रहेगी कि तृणमूल का चिन्ह 'जोड़ा फूल' था, आज नेताओं ने सचमुच जनता को 'डबल फूल' (दोहरा मूर्ख) बना दिया है। जो पार्टी कल तक केंद्र से लड़ रही थी, आज वह होटल के कमरों में अपनी ही 'पॉकेटमार' राजनीति से लड़ रही है। पर्दा गिरता है, तालियां बजती हैं, और बंगाल की जनता हाथ में 'डिम-भात' (अंडा-चावल) लिए इस मुफ्त के मनोरंजन का आनंद ले रही है!

देखते ही देखते ममता बनर्जी के पैर के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक गई और तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह ऐतिहासिक बगावत उठ खड़ी हुई। चिंता घोटालों से इकट्ठे किए गए काले धन की है और अपने कुकर्मों से भयभीत भ्रष्ट तृणमूली सत्ता के कवच के अभाव में अपनी सुरक्षा खोज रहें हैं। भाजपा गैलरी में बैठकर इस खेल का लुत्फ उठा रही है। कोई कह रहा है यह तो ट्रेलर है। इब्तदा इश्क है रोता है क्या, आगे-आगे देख होता है क्या..

बंगाल की जनता ने लेफ्ट के, बुद्धदेब भट्टाचार्य के विकल्प के रूप में इन्हे ताकत दी थी। ये खुद तो अपने कर्मों से खत्म हुए और भाजपा को बंगाल में ले आए। भाजपा आराम से विधानसभा से लोकसभा तक स्वाद ले-लेकर इनका 'ब्रेकफ़ास्ट' करेगी। मदारी के इशारे पर बंदर-बंदरिया सड़क से संसद तक करतब दिखाएंगे। यह बेमिसाल ठप्पा विपक्ष भारतीय लोकतंत्र की अनोखी बानगी है। और जनता के हाथ में सिर्फ ताली बजाना है... जो बोएगा, वही पाएगा, तेरा किया आगे आएगा....


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...और आगे आया है श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल दिवस, रेड रोड को 7 दिन बंद रखकर योगा-डे, हूग़ली नदी में 500 नावों का प्रहसन , किसी राजनीतिक सोहरावर्दी की आड़ में किसी भले शिक्षाविद-सर्जन सोहरावर्दी का नाम मिटाकर गोपाल पाठा के नाम पर सांप्रदायिक कार्ड खेलना और खुश होकर जनता के लिए नहीं "कॉर्पोरेट के लिए जमीन लूट, मध्यवर्ग के लिए ठोस राहत की जगह लोक-लुभावन भत्ते और अल्पसंख्यकों के बजट पर कैंची चला कर बहुसंख्यकों को सांप्रदायिक तरावट देने का दस्तावेज" बजट के रूप में। तो पेश-ए-खिदमत है विपक्ष के कॉमेडी शो के समानांतर सत्ता का कॉमेडी शो । कोई दूरदर्शिता नहीं। बस चुटकियों में विकास।

जनता का निर्णय, जनता का नतीजा। 5 साल है, क्या कीजे ! तो बहकिए मत, स्थिर रहिए। सूचनाओं के विश्वसनीय स्रोत रखिए, सत्ता पर विपक्ष की-सी आँख रखिए। सड़क पर उतरने के लिए तैयार रहिए।

बंगाल की राजनीति गंभीर विमर्श का विषय है, मनोरंजन का नहीं। शुक्र है कि राज्य में 'लेफ्ट' है, कोने-कोने में है और पूरे लय में है। तपे -तपाए जमीन से जुड़े वाम नेता हैं। प्रगतिशील युवा और संगठित टीम हैं। बंगाल की जन-चेतना के लिए 'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' ही अंतिम बात है। और यह देश के लिए भी सच है।


अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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