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'सोहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलना इतिहास को विकृत करने की खतरनाक साजिश: माकपा

केशव कुमार भट्टड़21 जून 20264 मिनट पठन100 बार पढ़ा गया

कोलकाता के सोहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने के फैसले पर माकपा (सीपीआई-एम) ने राज्य की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया है। पार्टी ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने इसका तीव्र प्रतिवाद करते हुए कहा कि सत्ताधारी दल को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को प्रचार का हथियार बनाना बंद करना चाहिए।

'सोहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलना इतिहास को विकृत करने की खतरनाक साजिश: माकपा


कोलकाता: कोलकाता के 'सोहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलने के फैसले पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (माकपा, सीपीआई-एम) ने राज्य की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया है। पार्टी ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने इसका तीव्र प्रतिवाद करते हुए कहा कि सत्ताधारी दल को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को प्रचार का हथियार बनाना बंद करना चाहिए।

'सोहरावर्दी एवेन्यू' का नामकरण अविभाजित बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन शहीद 'सोहरावर्दी' के नाम पर नहीं किया गया था। यह नामकरण विशिष्ट शिक्षाविद्, चिकित्सक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त बुद्धिजीवी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सर हसन 'सोहरावर्दी' की स्मृति में किया गया था।


ऐतिहासिक तथ्यों से अनभिज्ञ हैं मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री: मोहम्मद सलीम

एक आधिकारिक बयान जारी कर मोहम्मद सलीम ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, उच्च शिक्षा मंत्री और इस फैसले से जुड़े अन्य लोगों से अपने भ्रामक व असत्य बयानों को तुरंत वापस लेने की मांग की। उन्होंने पूछा - "क्या राज्य के मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री को यह बुनियादी ऐतिहासिक तथ्य भी नहीं पता? अगर वे अनजान हैं, तो यह उनकी घोर अज्ञानता है। और अगर वे सब कुछ जानते हुए भी यह दुष्प्रचार कर रहे हैं, तो यह इतिहास को लेकर बोला जा रहा सफेद झूठ है।" मोहम्मद सलीम ने कहा, ‘‘यह कोई अकेली घटना नहीं है। यह इतिहास को विकृत करके, लोगों को गुमराह करके और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तत्व के रूप में इस्तेमाल करके राजनीतिक लाभ उठाने की एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है। तथ्यों, अनुसंधान और दस्तावेजों पर आधारित इतिहास के अध्ययन के बजाय भावनाओं, द्वेष और अर्धसत्य को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।’’


क्या है 'सोहरावर्दी एवेन्यू' का असल इतिहास?

माकपा ने स्पष्ट किया कि 'सोहरावर्दी एवेन्यू' का नाम अविभाजित बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सोहरावर्दी के नाम पर नहीं रखा गया था। बल्कि यह सड़क प्रख्यात शिक्षाविद्, चिकित्सक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त बुद्धिजीवी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सर हसन सोहरावर्दी की स्मृति में समर्पित थी।


ट्वीट कर मुख्यमंत्री ने उकसाईं सांप्रदायिक यादें

दरअसल, रविवार को भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ट्वीट कर कोलकाता म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के इस फैसले का स्वागत किया, जिसके तहत इस सड़क का नाम बदलकर 'गोपाल मुखर्जी' के नाम पर कर दिया गया है। अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री ने लिखा कि 'दशकों से कोलकाता की सड़कें उन लोगों के नाम पर थीं जिन्होंने सत्ता का दुरुपयोग किया, जबकि गोपाल मुखर्जी ने आगे आकर लोगों की जान बचाई थी।' विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री ने इस बहाने 1946 के दर्दनाक सांप्रदायिक दंगों और हत्याकांड की यादों को हवा देने की राजनीति की है। उन्होंने ट्वीट के जरिए उस समय ब्रिटिश भारत में अविभाजित बंगाल के प्रधानमंत्री हसन शहीद सोहरावर्दी को ‘सत्ता के दुरुपयोग’ के लिए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की है लेकिन सोहरावर्दी नाम का घालमेल कर 'सत्ता के दुरुपयोग' का ठीकरा प्रख्यात शिक्षाविद्, चिकित्सक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त बुद्धिजीवी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सर हसन सोहरावर्दी के सिर पर फोड़ दिया गया है, जिनके नाम पर सड़क का नामकरण था।

बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा का अपमान

माकपा ने इस कदम को केवल एक तथ्यात्मक भूल मानने से इनकार कर दिया है। पार्टी के अनुसार, यह राजनीतिक स्वार्थ के लिए इतिहास को विकृत करने और समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने का एक बड़ा एजेंडा है। बयान में आगे कहा गया कि यह बेहद शर्मनाक है कि जिस बंगाल ने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर, जगदीश चंद्र बसु और मेघनाद साहा जैसे महान मनीषियों की ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाया, आज उसी राज्य के शासक तथ्यों को इतनी निर्लज्जता से तोड़-मरोड़ रहे हैं। यह पूरे बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का अपमान है।

पहले भी हुए हैं इतिहास से खिलवाड़ के प्रयास

मोहम्मद सलीम ने आगाह किया कि यह कोई इकलौती घटना नहीं है। इससे पहले भी 20 जून को ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ मनाने और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को ‘बंगाल का जनक’ साबित करने के सरकारी प्रयासों में इतिहास को विकृत करने और अर्धसत्य फैलाने के कई प्रमाण मिल चुके हैं। वामपंथ का मानना है कि तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित वास्तविक इतिहास की जगह अब समाज में नफरत, द्वेष और भावनाओं को थोपने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।

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स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति

अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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