जन समाचार मंच

- श्रेया जायसवाल
अपलोडर: VKA-43UUB7
क्या यह लेख उपयोगी था?
अपलोडर: VKA-43UUB7 • प्रकाशित: 26 अगस्त 2026 • 1 मिनट पठन

प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।
28 अगस्त 2026

फ़िल्म बताती है कि दंगे दोनों तरफ से हुए थे । हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों को मारा और मुसलमानों ने हिंदुओं और सिखों को मारा। सरहद के दोनों तरफ दरिंदगी का नंगा नाच चल रहा था। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने कहा था कि पंजाबी ही पंजाबी को मार रहा था। विभाजन के समय सबसे भयावह दंगे पंजाब में ही हुए थे। लेकिन बंटवारे के समय हुए दंगों के कारण पंजाब के बाशिंदों को मजबूर होकर अपना घर और गाँव छोड़ना पड़ा। माना जाता है कि दंगों में दस से बीस लाख लोग मारे गए जिनमें हिन्दू, सिख और मुसलमान तीनों शामिल थे। मानव इतिहास में विस्थापन की ये सबसे बड़ी और भयावह घटना थी।
27 अगस्त 2026

शिक्षकों की कमी की तस्वीर भी चिंताजनक है। 520 स्कूलों में 8,596 छात्र होने के बावजूद एक भी शिक्षक नहीं है। वहीं 5 हजार 152 अन्य स्कूलों में 1.76 लाख से अधिक छात्रों के लिए केवल एक-एक शिक्षक है।
26 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
केशव कुमार भट्टड़ • 26 अगस्त 2026

सहकारिता आंदोलन के माध्यम से लंबे समय तक निरंतर एक निडर समाचार पत्र प्रकाशित करने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी।
पश्चिम बंगाल राज्य सहकारिता बैंक की पूर्व निदेशक प्रीति गुहा मजुमदार का वामपंथी श्रमिक-कर्मचारी, महिला और छात्र-युवा आंदोलनों से गहरा नाता था। उनके निधन से सत्ययुग प्रेस के कर्मचारी और सांध्य सत्ययुग' समाचार पत्र के पत्रकार गहरे शोक में हैं।
राजीव कुमार पाण्डेय • 19 जून 2026

तीजन बाई सिर्फ गायिका नहीं थीं — वे एक विद्रोही कलाकार थीं, जो परंपरा की सीमाओं को लांघकर आगे बढ़ीं। उनकी आवाज में महाभारत का पराक्रम,पीड़ा,नीति और छत्तीसगढ़ की आत्मा थी। उन्होंने साबित किया कि कला कोई लिंग नहीं जानती, वह तो सिर्फ साधना और समर्पण मांगती है।
केशव कुमार भट्टड़ • 05 जुलाई 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...